शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

१०१. लालच

लद्दाखी मार्मोट(एक तरह का चूहा)




बहुत सोच-समझकर बस्ती से दूर
यहाँ जंगल में महफूज़ जगह  पर
तुमने अपना ठिकाना बनाया,
पर अब यह जगह सुरक्षित नहीं रही,
अब हमने यहाँ तक सड़कें बना ली हैं,
हमने तुम्हें ढूंढ निकाला है,
अब तुम हमारे मनोरंजन का साधन हो.

हम तुम्हारे ठिकाने देखेंगे,
सड़े-गले बिस्किट फेंककर,
बचे-खुचे वेफर्स दिखाकर
तुम्हें ललचाएंगे,
बिल से बाहर निकालेंगे,
तुम्हारे साथ फोटो खिंचवाएंगे,
फिर तुम्हें अंदर जाने देंगे,
या शायद न जाने दें.

बिस्किट और वेफर्स का लालच छोड़ 
तुम बिल में ही क्यों नहीं रहते,
तुम भूख से नहीं मरोगे,
जंगली जानवरों से भी नहीं,
तुम अपने बिल में जीवित रहोगे,
अगर तुम अपने लालच से बच जाओ.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 14/10/2013 कोकुछ पंखतियों के साथ नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

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  2. मरोगे तो बस इन्सान से .... अभी न कभी ...
    संवेदनशील रचना ...
    दशहरा की मंगल कामनाएं ...

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  3. लालच इंसान नहीं छोड़ता
    वो बेचारा ........ ????
    विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनायें
    स्वस्थ्य और सफल दीर्घायु हो

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  4. सच कहा....
    सार्थक रचना....
    सादर
    अनु

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  5. Bahut Hi Achhi Kavita Ki Prastuti Aapke Dwara. Padhe Love Poems, प्यार की कहानियाँ Aur Bhi Bahut Kuch in Hindi.

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