शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

१००. मुज़फ्फरनगर से


मुज़फ्फरनगर, तुम्हें शायद याद न हो,
पर स्वाधीनता के आंदोलन में 
तुम्हारे पुरखे- हिंदू और मुसलमान-
साथ-साथ लड़े थे अंग्रेजों से.

विभाजन के समय 
जब देश जल रहा था,
तुम शांत बने रहे;
बाबरी मस्जिद टूटी,
पर तुम जुड़े रहे.

फिर इस बार क्या हुआ तुम्हें,
क्यों भूल गए अपना इतिहास,
क्यों भूल गए अपनी संस्कृति?
क्यों कर दिया तुमने
हिंदुओं के मुज़फ्फरनगर को 
मुसलमानों के मुज़फ्फरनगर से अलग?

क्या तुम्हारा पानी बदल गया 
या हवा बदल गई अचानक?
ऐसा क्या हो गया कि
वहशियत की हदें तोड़ दीं  तुमने?

बहुत गलत किया तुमने,
विरासत दागदार हो गई तुम्हारी,
बदनाम हो गए तुम,
मुज़फ्फरनगर, अब तुम चुपचाप 
अपना नाम बदल लो.

4 टिप्‍पणियां:

  1. क्या तुम्हारा पानी बदल गया
    या हवा बदल गई अचानक?
    ऐसा क्या हो गया कि
    वहशियत की हदें तोड़ दीं तुमने?

    नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनायें-

    RECENT POST : पाँच दोहे,

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  2. बहुत प्रभावी ... पर बेचारा मुजफ्फरनगर क्या करे ... वो भी तो शिकार है इस गन्दी सियासत का ..

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  3. पहली बार आपकी कविताएं पढ़ने का मौका मिला। बहुत अच्छी हैं। खास कर ‘मुजफ्फरनगर से’...

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