शनिवार, 13 जुलाई 2013

८९.मेले में कविता

मेले में बहुत कुछ होता है,
तरह-तरह के नज़ारे - 
चूड़ियाँ,सलवार-दुपट्टे,
सुन्दर-सुन्दर खिलौने,
झूलों पर झूलते लोग,
जलेबियां और समोसे,
हँसते-खिलखिलाते चेहरे,
मायूस, उदास चेहरे,
ठग, चोर-उचक्के,
मासूम-से बच्चे.

कविताएँ उगाने के लिए 
मेले की मिट्टी माफ़िक होती है,
पर मेले की भीड़ में 
कविताएँ गुम भी हो जाती हैं.

मैं हर साल मेले में जाता हूँ,
क्योंकि पिछले साल खोई हुई कविताएँ 
कभी-कभी अगले साल के मेले में मिल जाती हैं.

8 टिप्‍पणियां:

  1. मेले में कविताओं का खोना ...एक अलग ही सोच है हाँ कवितायें मिल ज़रूर जाती हैं :)

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  2. मेले में खोया कहीं वापस मिला है कभी???
    जो कविता मिली वो वहीं बस गयी होगी शायद....

    अनु

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  3. ख्याल अच्छा है, लेकिन खोया हुआ इतनी आसानी से मिलता कहा है,

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  4. बहुत खूब ... ख्पोई हुई कविताओं का मिलना भी सुखद एहसास रहता अहि ... फिर मेले भी तो ऐसे ही जीवित रहते हैं ..

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  5. क्योंकि पिछले साल खोई हुई कविताएँ
    कभी-कभी अगले साल के मेले में मिल जाती हैं.

    ....लाज़वाब अहसास...

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