शनिवार, 6 अप्रैल 2013

७५. वसंत में पतझड़


पतझड़ ने छीन लिए पेड़ों से पत्ते,
परिंदों से बसेरे, पथिकों से छाया,
मायूसी बिखेर दी बगिया में.

दिनों-दिन गुज़र गए,
बुझने लगी उम्मीद
कि अचानक वसंत आया,
कोंपलें फूटीं,
कोमल हरी पत्तियों ने ढक लिया पेड़ों को,
फूल मुस्करा उठे डालियों पर,
पेड़ों की छाया में पथिकों ने
फिर विश्राम किया,
फिर छाईं खुशियाँ,
फिर जगा विश्वास,
फिर खिलीं उम्मीदें.

कुछ पेड़ फिर भी उदास रहे,
उलझे रहे अतीत में,
आकलन करते रहे नुकसान का,
जो पतझड़ में उन्हें हुआ था.

वसंत आया,
पर वे बेखबर रहे,
उन पेड़ों पर न पत्तियां आईं, न फूल,
उनको न पथिकों ने पूछा, न परिंदों ने,
वे ठूंठ के ठूंठ बने रहे,
वसंत में भी पतझड़ झेलते रहे.

10 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ पेड़ फिर भी उदास रहे,
    उलझे रहे अतीत में,
    आकलन करते रहे नुकसान का,
    जो पतझड़ में उन्हें हुआ था.

    जो अतीत में ही विचरण करता रहता है वो खुशियों को दूर कर देता है ... अच्छी सीख देती रचना

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  2. बहुत बेहतरीन सुंदर अभिव्यक्ति !!! बधाई ओंकार जी...

    RECENT POST: जुल्म

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  3. संगीता जी की टिप्पणी से सहमत हूँ. वक्त का दंश तो होता है लेकिन जिंदगी आगे भी बढ़नी चाहिए/

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  4. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन भाव लिए रचना..
    :-)

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  5. गहन अनुभूतियों को सहजता से
    व्यक्त किया है आपने अपनी रचना में
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग jyoti-khare.blogspotin
    में भी सम्मलित हों ख़ुशी होगी

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  6. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन भाव लिए रचना..

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  7. कुछ पेड़ फिर भी उदास रहे,
    उलझे रहे अतीत में,
    आकलन करते रहे नुकसान का,
    जो पतझड़ में उन्हें हुआ था.

    ...केवल अतीत का चिंतन रोक देता है प्रयास आगे बढ़ने का..बहुत गहन और सार्थक अभिव्यक्ति..

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  8. सुंदर एवं भावपूर्ण रचना...

    आप की ये रचना 19-04-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  9. बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति!!
    पधारें बेटियाँ ...

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  10. बहुत खूब .बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    पधारें मेरी नबीनतम पोस्ट पर
    हालात कैसे आज बदले है.
    ग़ज़ल
    आखिर क्यों

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