रविवार, 9 अगस्त 2020

४६८. पानी

Water, Wastage, Save, Water Public, Tap


मेरे गाँव की औरतें 

जमा होती हैं रोज़ 

सुबह-शाम पनघट पर.

घर से लेकर आती हैं 

मटका-भर उदासी,

वापस ले जाती हैं 

थोड़ा-सा पानी 

और ढेर सारी ख़ुशी.

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 10 अगस्त 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  3. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 11 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



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  4. लाज़वाब!!! आपने कविता को एक ताजी हवा दी है। बधाई!!!

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  5. और उस जरा सी खुशी का कोई मुकाबला नहीं हो सकता।

    सादर

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  6. घर की बोरियत भरी उदासी मटका भर लाती हैं पनघट पर सखियों संग खिलखिलाती हैं और खुशियों से भर जाती हैं
    बहुत लाजवाब...
    वाह!!!

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  7. बेहतरीन कविता । आभार ।

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  8. ताजगी के एहसास ले जाती हिं पानी के साथ ...
    बहुत खूब ...

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