गुरुवार, 9 जुलाई 2020

४५५.उद्घोष


Leaf, Green, Environment, Natural, Plant

वह बगीचा वीरान था,
न फूल थे वहां,न फल,
डालियाँ सूख गई थीं,
कलियाँ कुम्हला गई थीं,
पौधे निर्जीव से खड़े थे.

बस एक पत्ता था,
जो अब भी हरा था,
पूरी सृष्टि उसे  
सुखाने पर आमादा थी.

वह अदना-सा पत्ता 
मृत्यु के सन्नाटे में 
जीवन का उद्घोष था.

11 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (10-07-2020) को
    "बातें–हँसी में धुली हुईं" (चर्चा अंक-3758)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. जीवन के उद्धोष के लिए एक पत्ते का संघर्ष प्रेरक है।
    सुंदर रचना सर।
    सादर।

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  3. सकारत्मक ऊर्जा का संचार करती रचना

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  4. आ ओंकार जी, आपने एक पत्ते के संघर्ष से सार्थक सन्देश दिया है | ये पंक्तियाँ बहुत :
    बस एक पत्ता था,
    जो अब भी हरा था,
    पूरी सृष्टि उसे
    सुखाने पर आमादा थी.-- ब्रजेन्द्र नाथ

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  5. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा,आपकी रचना बहुत अच्छी हैं।

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  6. वाह!जीवन दर्शन ...
    एक पत्ते का उद्धोष.
    सादर

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  7. जीवन दर्शन करता सुंदर सृजन,सादर नमन आपको







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  8. दोहा – बुद्धि हीन तनु जानि के सुमिरौं पवन कुमार।
    बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश बिकार।।

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  9. बहुत खूब ओंकार जी | नाउ उम्मीदी में एक छोटी सी आशा की किरण है ये एकमात्र हरा पता | वाह ! कितनी सरलता से बहुत बड़ी बात कह दी आपने | शानदार !

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