शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

४०३. सूरज

Seascape, New Zealand, Sunrise

सुबह-सुबह अँधेरा छाया है,
पर घबराने की बात नहीं,
कभी-कभी ऐसा हो जाता है.

यह रात नहीं है,
रात तो बीत चुकी है,
बस सूरज नहीं निकला है,
वह लड़ रहा होगा,
निकलने की कोशिश कर रहा होगा.

अँधेरा कितना ही गहरा हो,
सूरज लड़ना नहीं छोड़ेगा,
वह निकलेगा ज़रूर,
अभी नहीं,तो थोड़ी देर में,
आज नहीं तो कल.

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 16 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जो लगा रहता है वो दिखने लगता है।
    सुंदर अभिव्यक्ति।
    आइयेगा- प्रार्थना

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (17-02-2020) को 'गूँगे कंठ की वाणी'(चर्चा अंक-3614) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  4. वाह !बहुत ही सुन्दर सृजन
    सादर

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  5. वाह!!!
    बहुत सुन्दर सार्थक सृजन।

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