शनिवार, 27 अगस्त 2016

२२५. रात की आवाज़

गहरी काली रात,
न चाँद, न सितारे,
न कोई किरण रौशनी की.

चारों ओर पसरा है 
डरावना सन्नाटा,
सिर्फ़ सांय-सांय 
हवा बह रही है.

दुबके हैं लोग घरों में,
कुछ नींद में हैं,
तो कुछ होने का 
नाटक कर रहे हैं.

लम्बी गहरी रात 
अब ऊब रही है,
जाने को बेचैन है,
पर ख़ुद नहीं जायेगी.

ज़रा ध्यान से सुनो,
जिस रात से तुम सहमे हुए हो,
वह तुमसे कह रही है
कि सोनेवालों, उठो,
मुझे भगाने की पहल करो,
सूरज तुम्हारे दरवाज़े पर
दस्तक दे रहा है. 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 28 अगस्त 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सूरज तुम्हारे दरवाज़े पर
    दस्तक दे रहा है......bahut sundar rachna

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (29-08-2016) को "शैक्षिक गुणवत्ता" (चर्चा अंक-2450) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. हर रात की सुबह होती है ... आशा का संचार करती हुई कविता !
    सुंदर!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  5. रात के आगे देखने का हौसला देती रचना...

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  6. बहुत आभार ....कविता पढ़वाने के लिए

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