शनिवार, 24 अगस्त 2013

९४.रास्ते

मत करो रास्तों को समतल,
इन्हें ऊबड़-खाबड़ ही रहने दो.

सीधे-सपाट रास्तों पर चलकर 
चलने का मज़ा नहीं आता,
रास्ते टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे हों,
कहीं गड्ढे,कहीं कंकड़,कहीं कांटे हों,
तो लगता है, चल रहे हैं.

सीधे-सपाट रास्तों पर चलकर 
सुस्ती महसूस होती है,
छायादार पेड़ के नीचे बैठकर 
पलकें झपकाने का मन होता है,
चलना मुश्किल हो जाता है.

अच्छा तो यही है कि
ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी न हों,
मंजिल तक भले न पंहुचें,
रास्ता बनाने की कला तो सीखें.

मंजिल तक पंहुचने के लिए,
वहाँ तक राह बनाने के लिए
या फिर चलने की खुशी के लिए 
ज़रुरी है कि रास्ते ऊबड़-खाबड़ हों 
या फिर बिल्कुल न हों.

8 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया है भाई ओंकार-
    बधाई-

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  2. रास्ते टेढ़े-मेढ़े, ऊंचे-नीचे हों,
    कहीं गड्ढे,कहीं कंकड़,कहीं कांटे हों,
    तो लगता है, चल रहे हैं...

    अच्छा तो यही है कि
    ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी न हों,
    मंज़िल तक भले न पहुंचें,
    रास्ता बनाने की कला तो सीखें...

    वाह वाऽहऽऽ…!

    आदरणीय बंधुवर ओंकार जी
    बहुत प्रेरणादायिनी रचना है आपकी...
    साधुवाद ! आभार !!

    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. मंजिल तक पंहुचने के लिए,
    वहाँ तक राह बनाने के लिए
    या फिर चलने की खुशी के लिए
    ज़रुरी है कि रास्ते ऊबड़-खाबड़ हों
    या फिर बिल्कुल न हों.

    ...अपने बनाए रास्तों पर चलने का आनंद कुछ और ही होता है...बहुत प्रभावी और प्रेरक रचना..

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  4. एक शेर याद आ गया ...
    बेतजुस-सुस् आ गई मंजिल अगर जेरे कदम
    दिल में मेरे जुस्तजू का होंसला रह जाएगा ...

    लाजवाब है ये रचना बहुत ही ...

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  5. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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