गुरुवार, 15 अगस्त 2013

९३. कविता- अधूरी या पूरी ?

कभी-कभी मन करता है,
वह वर्षों पुरानी कविता पूरी कर दूं.

जब तुम्हारी एक झलक पहली बार देखी थी,
फिर महीनों तक चोरी-छिपे देखता रहा था,
जब कई दिनों के इंतज़ार के बाद 
पहली बार तुम्हें हँसते देखा था
और यह भी कि जब तुम हँसती थी 
तो तुम्हारे गालों में डिम्पल पड़ जाते थे,
जब पहली बार तुम्हारी आवाज़ सुनी थी,
तुमसे ज़रा-सी बात करने के लिए 
न जाने कैसे-कैसे बहाने ढूंढे थे,
कितनी हिम्मत जुटाई थी
कितनी रिहर्सल की थी,
जब पहली बार तुम्हारी आँखों के रंग में 
मैंने हल्का-सा हरापन महसूस किया था,
जब पहली बार मैंने डरते-डरते
तुमसे मन की बात कही थी 
और तुमने तुरंत जवाब दिया था,
"नहीं"....

बहुत बार कागज़-कलम लेकर बैठा,
पर आगे कुछ लिख ही नहीं पाया,
लगता है,आज भी कुछ वैसा ही होगा,
पर आज कविता कुछ अलग-सी लग रही है.

जो कविता मैंने कभी मन से लिखी थी,
आज वही बहुत बचकानी लगती है,
जो सालों तक अधूरी महसूस होती रही,
आज लगता है, वह तो शुरू से ही पूरी थी.

6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम तो पूर्ण होता है प्रारम्भ से ही ... बस पूर्ण से पूर्णतः होता रहता है ... भावमय ...
    स्वतंत्रता दिवस की बधाई ...

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  2. उम्र गुज़र जाती है एक मुकम्मल कविता लिखने में..
    बहुत सुन्दर!!!

    अनु

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  3. सुंदर कविता लिखने वक्त तो लगता ही है ,,,

    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,

    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

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  4. दिल को छूती बहुत भावपूर्ण रचना...बहुत सुन्दर

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  5. bahoot badhiya sir, aise v pyar k sampurnata k liye haan ki jarurat nahi hoti :)

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  6. बहुत सुंदर भाव और खुबसूरत प्रस्तुति !!

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