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सोमवार, 19 जनवरी 2026

831. पतंग


 

बहुत पतंगें थीं आसमान में,

जिनमें से एक हठात कट गई,

बड़ी देर से उड़ रही थी,

हिचकोले खा रही थी,

फिर संभल भी रही थी। 


लड़ना आता था उसे,

मज़बूत थी उसकी डोर,

तेज़ था उसका माँझा,

लग नहीं रहा था कि कटेगी,

हिम्मतवाली थी वह बूढ़ी पतंग। 


कोई नहीं जानता 

कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,

पर इतना तो तय है 

कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,

कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,

कितनी भी मज़बूत हो उसकी डोर,

कटना ही पड़ता है हर पतंग को,

फटना ही पड़ता है कभी-न-कभी। 


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

830. इस बार का भोगाली बिहू

 


इस साल लड्डुओं में
मिठास कुछ कम है,
भेलाघर* अच्छा है,
पर पहले-सा नहीं है।

मेजी** की आंच मद्धिम है,
चिड़वा थोड़ा कच्चा,
दही खट्टा है,
गुड़ का रंग अच्छा है,
पर स्वाद वैसा नहीं है।

गुनगुना तो रहे हैं सभी,
पर गीतों में रस नहीं है,
नाच भी रहे हैं, पर पाँवों में
वह थिरकन नहीं है।

सब कुछ पहले-सा है,
पर ध्यान से देखूँ,
तो बदला-बदला,
बुझा-बुझा सा है ।

समय लगता है मौसम को
करवट बदलने में,
ज़्यादा दूर नहीं है रंगाली बिहू,
न जाने कितना अलग होगा वह
इस साल के भोगाली बिहू से ।

*भेलाघर- एक अस्थाई झोपड़ी, जो भोगाली बिहू के अवसर पर बनाई जाती है।
**मेजी- पवित्र अग्नि

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

829. किसे ले गई ट्रेन ?



कई लोग थे प्लेटफॉर्म पर,

एक को चढ़ना था,

बाक़ी सब चढ़ाने आए थे।


ट्रेन आई, तो वह चढ़ गया,

जो चढ़ाने आया था,

जिसका कोई इरादा नहीं था

यात्रा पर निकलने का, 

जिसका सामान घर पर रखा था।

 

जिसे चढ़ना था,

उसका सामान बंधा ही रह गया,

वह प्लेटफॉर्म पर बैठा

इंतज़ार कर रहा है अगली ट्रेन का

जो न जाने कब आएगी,

न जाने किसे ले जाएगी।