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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2024

७५७.अब तो उठ

 


बहुत आराम कर लिया, अब तो उठ,

सूरज आसमान में है, अब तो उठ. 


कब तक बैठेगा मायूस होकर,

फ़िसल रहा है जीवन, अब तो उठ. 


शर्म आ रही थी तुझे हाथ फैलाने में,

वह ख़ुद देने आया है, अब तो उठ. 


किसी को नहीं मिलता बार-बार मौक़ा,

हो रही है दस्तक, अब तो उठ. 


सुना नहीं तूने रोना बेक़सूरों का,

इन्तहाँ हो गई है अब, अब तो उठ. 


आसान नहीं ख़ुद से नज़रें मिलाना,

आईना दिखाना है तुझे, अब तो उठ. 


वैसे तो बंद हैं तेरे कान एक अरसे से,

ज़मीर पुकार रहा है, अब तो उठ.  


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" रविवार 18 फरवरी 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

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  2. किसी को नहीं मिलता बार-बार मौक़ा,
    हो रही है दस्तक, अब तो उठ.
    वाह !! अति सुन्दर !!

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  3. आसान नहीं ख़ुद से नज़रें मिलाना,
    आईना दिखाना है तुझे, अब तो उठ',,,,,,

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    1. बहुत सुंदर और सत्य को प्रेरित करती रचना,

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  4. जब जागो तभी सवेरा, जग जोगी वाला फेरा

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  5. शर्म आ रही थी तुझे हाथ फैलाने में,

    वह ख़ुद देने आया है, अब तो उठ.
    सुन्दर रचना . बहुत शुभकामनाएं .

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