शनिवार, 31 दिसंबर 2016

२४१. बीते साल की पीड़ा




साल-भर मैंने तुम्हारा साथ दिया,
तुम्हारे सुख में हंसा, तुम्हारे दुःख में रोया,
तुम्हारी सफलताओं पर इतराया,
तुम्हारी विफलताओं पर हौसला बढ़ाया,
तुम सोये, पर मैं जागता रहा,
आराम नहीं किया पल भर भी,
फिर क्यों फेर लिया मुंह तुमने,
क्यों झटक दी ऊँगली जो थाम रखी थी?

नए साल के स्वागत में इतना खो गए
कि तुम भूल ही गए, 
कभी मैं भी तुम्हारे साथ था,
मुझे विदा करना तो दूर 
मुड़ कर भी नहीं देखा तुमने.

अरे स्वार्थी, निष्ठुर, एहसानफ़रामोश,
मैं जा रहा हूँ तुमसे दूर,
फिर लौट कर नहीं आऊँगा,
तुम पुकारोगे तो भी नहीं,
पर जाते-जाते दुआ करूँगा
कि जैसा तुमने मेरे साथ किया,
कोई तुम्हारे साथ न करे.

रविवार, 18 दिसंबर 2016

२४०. दिलासा


जीवन-भर पुकारा मैंने,
पर तुमने सुना ही नहीं,
शायद मेरी आवाज़ में दम नहीं था,
या तुम्हारे सुनने में ही कुछ कमी थी.

अब जब जीवन की संध्या-बेला में हूँ,
तो मन रखने के लिए ही सही 
बस इतना-सा कह दो 
कि तुमने मुझे सुनकर 
अनसुना नहीं किया था. 

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

२३९. पिता

पिता, तुम्हारे जाने पर 
मैं बिल्कुल नहीं रोया,
न जाने क्यों?
शायद इसलिए 
कि रोना कमज़ोरी की निशानी है 
और मैं चाहता था 
कि मजबूत दिखूं.

तुम्हारे जाने के बाद से 
एक तालाब-सा बन गया है 
अन्दर-ही-अन्दर,
अब टूटा चाहता है बाँध,
बहा चाहता है पानी.

लोग कहेंगे, पागल है,
बेवज़ह रो रहा है,
इससे तो अच्छा था 
कि मैं तभी रो लेता.

पिता, जो बीत गया,
क्या उसे दोहराया जा सकता है?
फिर से चले जाने के लिए 
क्या तुम लौट कर आ सकते हो?

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

२३८.ज़मीन


लहरों, बहुत हो गया खेल-कूद,
बहुत हो गई मस्ती,
बहुत घुमा दिया तुमने मुझे 
बीच समुद्र में,
अब मुझे किनारे पर ले चलो.

चाहो तो पटक दो मुझे
चट्टानों के ऊपर,
पर महसूस करने दो मुझे 
पांवों के नीचे 
ज़मीन के होने का सुख.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

२३७. हज़ार के नोट

मुझे नहीं लगना लाइनों में,
नहीं बदलवाने हज़ार के नोट,
हालाँकि कुछ पुराने नोट 
मेरे पास महफ़ूज़ रखे हैं.

कर दिए होंगे उन्होंने बंद
हज़ार के नोट,
पर जो मेरे पास रखे हैं,
अनमोल हैं.

इनमें किसी की 
उँगलियों की छुअन है,
किसी की झलक है इनमें,
ये नोट जब पास होते हैं,
तो मुझे लगता है,
किसी के साथ हूँ मैं.

मेरे हज़ार के नोट का मूल्य 
अगर टैक्सवालों को पता चल जाय,
तो मेरे लिए बताना मुश्किल हो जाय 
कि इतनी संपत्ति मैंने कैसे जमा की 
और इसके बारे में अब तक 
किसी को बताया क्यों नहीं.

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

२३६. मछली



मैं कूद रही थी पानी में,
तैर रही थी बिना रुके,
इधर से उधर,
जहाँ भी मेरा मन किया,
मुझे लगा  
कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है,
जैसे पूरी दुनिया 
मेरे लिए ही बनी थी,
पर न जाने कब 
मैं जाल में फंस गई,
जाल, जो मेरे लिए ही 
किसी ने बिछा रखा था.
बहुत हाथ-पांव मारे मैंने,
बहुत तड़पी, बहुत चिल्लाई,
पर निकल नहीं पाई,
न ही जाल तोड़ पाई.
मैं क्यों सोच नहीं पाई 
कि जाल बिछानेवाले 
कमज़ोर हो सकते हैं,
पर जाल बहुत मजबूत होता है ?

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

२३५.समुद्र से


समुद्र, तुम रात-रात भर 
जो शोर करते हो,
किसे बुलाते हो?
माना कि तुम जानते हो,
यह सोने का समय नहीं है,
माना कि बहुत सी बाते हैं,
जो चीख-चीख के कहना ज़रूरी है,
पर कोई सुननेवाला भी तो हो.

समुद्र, यहाँ सब सो रहे हैं,
कोई नहीं सुन रहा तुम्हें,
किसी को फ़र्क नहीं पड़ता 
तुम्हारे गरजने से.

समुद्र, बंद करो चिल्लाना,
मेरी मानो,
थोड़ी देर तुम भी सो जाओ.

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

२३४. तकलीफ़

जो काँटा तुम्हारे पांव में चुभा है,
तुमको भी दुःख पहुंचाता है,
मुझे भी,
यह बात तुम भी जानते हो,
मैं भी,
पर शायद तुम यह नहीं जानते 
कि जो काँटा तुम्हारे पांव में चुभा है,
उससे तुम्हें जितनी तकलीफ़ है,
उससे ज़्यादा मुझे है.

काश कि काँटा मेरे पांव में चुभा होता,
काश कि मुझे तकलीफ़ कम होती.

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

२३३. दिवाली में दृष्टि परिवर्तन




दियों की रोशनी कुछ कम है इस बार,
तेल तो उतना ही है,
बाती भी वैसी ही है,
हवाएं भी नहीं हैं उपद्रवी,
फिर भी कम है रोशनी.

कहीं ऐसा तो नहीं 
कि रोशनी उतनी ही है,
पर आँखें कमज़ोर हो गई हैं
या यह भी हो सकता है 
कि आँखें कमज़ोर नहीं हुईं,
मन में ही कुछ फ़र्क आ गया है.

इस बार की दिवाली में 
सब कुछ पहले जैसा है,
कुछ भी नहीं बदला है,
पर दियों की रोशनी कुछ कम है.

मुझे लगता है 
कि इस बार की दिवाली में 
दृष्टि परिवर्तन की ज़रूरत है. 

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

२३२. करवा चौथ पर चाँद से


अरे निगोड़े चाँद,
इतना भी मत तड़पाओ,
अब निकल भी जाओ.

कब से बैठी हूँ इस आस में 
कि तुम निकलोगे तो कुछ खाऊँगी,
पर तुम हो कि जैसे 
नहीं निकलने की कसम खाए बैठे हो.

रोज़ तो बड़ी जल्दी आ जाते हो,
खिड़की से झाँकने लगते हो,
आज जब तुम्हारी ज़रूरत है,
तो नखरे दिखा रहे हो,
तड़पा रहे हो.

क्या तुम भी पुरुषों की तरह हो,
हमारी वेदना से अनजान,
क्या तुम भी उन जैसे हो,
हमारी बेबसी पर हंसनेवाले.

चलो, बहुत हुआ चाँद,
अब निकल भी जाओ,
तुम्हारा क्रूर मज़ाक कहीं 
तुम्हें महंगा न पड़ जाय.

कहीं ऐसा न हो 
कि महिलाएं व्रत तोड़ने के लिए 
तुम्हारा इंतज़ार करना छोड़ दें,
कहीं ऐसा न हो 
कि करवा चौथ से तुम 
निष्कासित कर दिए जाओ. 

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

२३१. दशहरा


चलो, आज शाम चलते हैं,
देखते हैं रावण का जलना,
बुराई पर अच्छाई की विजय,
देखते हैं कि किस तरह 
राख हो जाते हैं दस सिर,
किस तरह मारा जाता है कुम्भकर्ण,
किस तरह बरसती हैं चिंगारियां 
बेबस मेघनाद के बदन से.

चलो, आज शाम चलते हैं
दशहरे के मैदान में,
जहाँ हज़ारों लोग जमा होंगे,
बजाएँगे तालियाँ, देखेंगे तमाशा,
फिर घर लौट आएँगे.

यही होता है दशहरे में हर साल,
हर साल जलते हैं कागज़ के पुतले,
फूटते हैं पटाखे,
कभी किसी दशहरे में 
यह ख़याल ही नहीं आता  
कि असली रावण,कुम्भकर्ण,मेघनाद 
हमारे अन्दर ही कहीं छुपे हैं,
जो हर साल दशहरे में
बच जाते हैं जलने से. 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

२३०. प्यार

बहुत चाहता हूँ मैं तुम्हें,
ख़ुद से भी ज़्यादा,
कोई फ़िल्मी डायलाग नहीं है यह,
हकीक़त है,
जैसे किस्से कहानियों में
राजा की जान तोते में होती थी,
मेरी तुममें है.

सब कहते हैं
कि तुम्हारे लिए मेरा प्यार
उनकी समझ से परे है,
सब कहते हैं
कि तुम इतना प्यार डिज़र्व नहीं करते,
सच कहूं ,
तो मुझे भी यही लगता है,
पर प्यार यह देखकर तो नहीं होता
कि कौन उसके लायक है
और कितना.

मैं जानता हूँ
कि तुम उतने प्यार के हक़दार नहीं
जितना मैं तुम्हें करता हूँ,
पर मैं चाहूं भी
तो कुछ नहीं कर सकता,
क्योंकि यह मैं नहीं,
मेरा दिल है,
जो तुम्हें प्यार करता है.

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

२२९. पिता

पिता, तुम क्यों गए अचानक,
भला ऐसे भी कोई जाता है?
न कोई इशारा,
न कोई चेतावनी,
जैसे उठे और चल दिए.
तुम थोड़ा बीमार ही पड़ते,
तो मैं थोड़ी बातें करता,
थोड़ी माफ़ी मांगता,
तुम्हें बताता 
कि मैंने कब-कब झूठ बोला था,
कब-कब विश्वास तोड़ा था तुम्हारा,
कि मैं वह नहीं था,
जो तुम सोचते थे कि मैं था.
विस्तार से बताता तुम्हें वह सब
जो बताना चाहता था,
समय नहीं होता जो तुम्हारे पास,
तो कम-से-कम इतना ही कह देता 
कि पिता, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.

शनिवार, 17 सितंबर 2016

२२८. नमक

बहुत काम की चीज़ हूँ मैं,
थोड़ा सा खर्च होता हूँ,
पर स्वाद बढ़ा देता हूँ,
भारी हूँ सब मसालों पर.

घुल-मिल जाता हूँ आसानी से,
बिना किसी नाज़-नखरे के,
फिर भी ख़ास क़ीमत नहीं मेरी,
अपमान अनदेखी से दुखी हूँ मैं.

बहुत देर लगी मुझे समझने में 
कि जो आसानी से मिल जाता है,
वह कितना भी अच्छा क्यों न हो,
उसकी कद्र नहीं होती.

शनिवार, 10 सितंबर 2016

२२७. सेकेण्ड की सूई


मैं सेकेण्ड की सूई की तरह 
तेज़-तेज़ घूमता रहता हूँ,
पर हर बार ख़ुद को वहीँ पाता हूँ,
जहाँ मंथर गति से घूमनेवाली 
मिनट और घंटे की सूइयां होती हैं.

मैंने सोचा कि क्या मेहनत बेकार है,
क्यों मैं बार-बार वहीँ पहुँच जाता हूँ,
जहाँ मिनट और घंटे की सूइयां होती हैं,
क्यों मुझे नहीं मिलती कोई नई मंजिल.

जीवनभर घूमने के बाद मैं समझा 
कि मेहनत ही सब कुछ नहीं होती,
ज़रूरी है परिधि से बाहर निकलना,
ज़रूरी है उस खूंटे को तोडना 
जिससे बंधकर हम तेज़-तेज़ घूमते हैं.

शनिवार, 3 सितंबर 2016

२२६. आसमान में अक्स

चाँद, कितने भोले हो तुम,
झील में घुसकर सोच रहे हो 
कि छिप जाओगे.

छिपे भी तो कहाँ ? पानी में ?
छिपने की सही जगह तो तलाशते,
अपनी आभा ही कम कर लेते,
आभा कम हो, तो छिपना आसान होता है.

यहाँ तो तुम साफ़ दिख रहे हो,
लगता है, तुमने पानी ओढ़ लिया है
ताकि तुम और निखर जाओ,
ताकि तुम साफ़-साफ़ नज़र आओ.

चाँद, कितने भोले हो तुम,
झील में छिपे बैठे हो,
इतना भी नहीं जानते 
कि तुम्हारा तो अक्स भी 
आसमान में साफ़ नज़र आता है.

शनिवार, 27 अगस्त 2016

२२५. रात की आवाज़

गहरी काली रात,
न चाँद, न सितारे,
न कोई किरण रौशनी की.

चारों ओर पसरा है 
डरावना सन्नाटा,
सिर्फ़ सांय-सांय 
हवा बह रही है.

दुबके हैं लोग घरों में,
कुछ नींद में हैं,
तो कुछ होने का 
नाटक कर रहे हैं.

लम्बी गहरी रात 
अब ऊब रही है,
जाने को बेचैन है,
पर ख़ुद नहीं जायेगी.

ज़रा ध्यान से सुनो,
जिस रात से तुम सहमे हुए हो,
वह तुमसे कह रही है
कि सोनेवालों, उठो,
मुझे भगाने की पहल करो,
सूरज तुम्हारे दरवाज़े पर
दस्तक दे रहा है. 

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

२२४. बदले हालात

उन्हें पसंद नहीं 
तुम्हारा आँखें दिखाना.
वे कुछ भी कहें,
तुम सिर झुकाए सुनती रहो,
बीच-बीच में नाड़ हिलाकर 
हामी भर दो, 
तो और भी अच्छा.

बदले हालात को पहचानो,
अब छूट चुका है तुम्हारा मायका,
हो चुकी हो तुम किसी और की,
खो चुकी हो अपनी पहचान,
अब सिर्फ़ कठपुतली हो तुम.

जिस दुनिया में तुम हो,
वह एक अलग दुनिया है,
वहां शादीशुदा महिलाओं का  
आँखें दिखाना सख्त मना है.

शनिवार, 30 जुलाई 2016

२२३. ठूंठ



मुझे बहुत भाते हैं वे पेड़,
जिन पर पत्ते, फूल, फल
कुछ भी नहीं होते,
जो योगी की तरह
चुपचाप खड़े होते हैं -
मौसम का उत्पात झेलते.

इन्हें देखकर मुझे
दया नहीं आती,
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि ये पेड़,
जो मृतप्राय लगते हैं,
बड़े जीवट वाले होते हैं,
बहुत धीरज होता है इनमें.

जब फलों-फूलों से लदे
आसपास के हरे-भरे पेड़
इन्हें दया की नज़र से देखते हैं,
तो ये मन-ही-मन मुस्कराते हैं.

ये अच्छी तरह जानते हैं कि
जल्दी ही ये भी हरे-भरे होंगे,
अभी इनकी जड़ें सूखी नहीं हैं,
अभी बहुत जीवन शेष है उनमें.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

२२२. आँखें

वे नहीं चाहते 
कि औरतों के आँखें हों.

आँखें होंगी,
तो वे देख सकेंगी,
जान सकेंगी
कि क्या-क्या हो रहा है 
उनके ख़िलाफ़,
उन्हीं के सामने.

ज़बान से कुछ न बोलें,
तो भी हो सकता है 
कि आँखें दिखा दें,
या हो सकता है 
कि उनकी आँखों में 
झलक जाय 
उनकी नफ़रत.

कौन जाने 
कि चुपचाप देखते-देखते 
कभी उनकी ज़बान 
खुल ही जाय
या कुछ ऐसा हो जाय,
जिसकी कभी किसी ने 
कल्पना भी न की हो. 

वे नहीं चाहते 
कि उनकी दुनिया में,
जहाँ वे खुश हैं,
सुरक्षित हैं,
कोई हलचल हो,
इसलिए वे इस बात के ख़िलाफ़ हैं 
कि औरतों के भी आँखें हों.

बुधवार, 13 जुलाई 2016

२२१. उत्सव


आज सुबह बारिश हुई -
मूसलाधार बारिश,
भर गए सब खड्डे-नाले,
घुस गया पानी घरों में,
छिप गईं सड़कें,पगडंडियाँ,
रुक गया जैसे जीवन.

जब शाम हुई,
अस्त होते-होते मुस्करा उठा सूरज,
पानी की चादर पर बिखर गई 
ढेर सारी गुलाल
या गुलाब की पंखुडियां,
धरती-आकाश रंग गए 
एक ही रंग में.

कितनी भी कोशिश कर ले बारिश,
आख़िर मुस्करा ही उठता है सूरज,
कितना ही हो जाए विध्वंस,
रुकता कहाँ है उत्सव ?

शनिवार, 2 जुलाई 2016

२२०. अपराध-बोध

अब नहीं रहा वह पढ़ने का सुख,
किताबों की सोहबत में जागने का सुख,
पढ़ते-पढ़ते ख़ुद को भूल जाना,
कभी हँसना,कभी रोना, कभी सहम जाना,
कभी पीठ के बल, तो कभी पेट के बल,
हथेलियों में किताब थामे लेट जाना,
आँख लगते ही किसी बच्चे की तरह 
किताब का पेट पर चुपचाप सो जाना.

अब मैं हूँ, मेरा लैपटॉप, मेरा मोबाइल है,
देर रात तक जागता हूँ अब भी,
घूमता हूँ इन्टरनेट की दुनिया में,
पढ़ता हूँ कुछ काम की बातें, कुछ बकवास,
फिर सो जाता हूँ थककर
एक अजीब से अपराध-बोध के साथ.

अगली रात फिर वही सिलसिला,
फिर वही लक्ष्यहीनता,
आख़िर में फिर थककर सो जाना,
फिर वही अपराध-बोध.

आजकल मैं अकसर सोचता हूँ
कि अच्छी-बुरी आदत, जो पड़ जाती है,
उसे बदलना इतना मुश्किल क्यों होता है.

शुक्रवार, 24 जून 2016

२१९. आग


आग भभक उठी है,
तो दोष केवल तीलियों को मत दो,
आग लगाने के लिए 
माचिस की डिबिया भी चाहिए,
थोड़ा तेल, थोड़ा घी,
थोड़ी टहनियां,थोड़ा घास-फूस
और सबसे बढ़कर वे हाथ,
जो सारा सामान इकठ्ठा कर दें.

अकेली तीलियों की क्या औकात 
कि आग भड़का दें,
उन्हें तो बेअसर करने के लिए 
बूँद-भर पानी ही बहुत है.

शुक्रवार, 17 जून 2016

२१८.रहस्य


देर रात एक हादसा हुआ,
ग़लती से चाँद झील में उतर गया,
मैंने देखा उसे,
सतह पर चुपचाप पड़ा था,
पर ज़िन्दा था, क्योंकि हिल रहा था.

मैं परेशान था कि उसे बचाऊं कैसे,
झील से उसे निकालूँ कैसे,
इसी उधेड़बुन में सुबह हो गई.

बचाने की तैयारी पूरी हुई,
तो देखा कि चाँद ग़ायब था,
किसी ने उसे निकलते नहीं देखा,
गोताखोरों को नहीं मिली उसकी देह,
फिर क्या हुआ उस चाँद का,
जो कल रात झील में उतरा था.

शुक्रवार, 10 जून 2016

२१७. ग़म के आंसू



ग़म में निकलते हैं आंसू,
ख़ुशी में भी निकलते हैं,
जिस हाल में भी निकलें,
राहत-भरे होते हैं आंसू.

ग़म के हों या ख़ुशी के हों आंसू 
वैसे तो एक जैसे होते हैं,
पर न जाने मुझे 
ऐसा क्यों महसूस होता है 
कि जो आंसू ग़म में निकलते हैं,
उनमें नमक थोड़ा ज़्यादा होता है.

शुक्रवार, 3 जून 2016

२१६. पुराने ख़त

वे ख़त जो तुमने कभी लिखे थे,
मैंने पढ़कर रद्दी में डाल दिए थे,
कितना नासमझ था मैं,
ताड़ नहीं पाया प्रगति की रफ़्तार,
समझ नहीं पाया कि धीरे-धीरे 
बंद हो जाएंगे हथलिखे ख़त.

जुड़े रहेंगे लोग हर समय, 
फ़ोन से, इन्टरनेट से,
देख सकेंगे एक दूसरे को,
कर सकेंगे चैटिंग.

अब तुम्हारे ख़त बंद हो गए हैं,
हम रोज़ बात करते हैं आपस में,
रोज़ देखते हैं एक दूसरे को,
पर सब कुछ यंत्रवत सा है,
अब कहाँ वह इंतज़ार का मज़ा,
अब कहाँ वह फ़ासले की तड़प?

वह तड़प, वह बेकरारी,
मैं कहाँ से खोजूं स्मृतियों में,
मुझे तो याद भी नहीं
कि तुम्हारे ख़त, जो पढ़कर 
मैंने रद्दी में डाल दिए थे,
उनमें तुमने लिखा क्या था.

रविवार, 22 मई 2016

२१५. कौन

वे चुप हैं जिनसे उम्मीद थी ख़िलाफ़त की,
कहीं और चलते हैं, अब बचाएगा कौन ?

पहचाना सा लगता है मुझे हर एक चेहरा,
कौन यहाँ दोस्त है, दुश्मन है कौन?

हवाएं लौटी होंगी दरवाज़े से टकराकर,
किसको पड़ी है, यहाँ आएगा कौन?

वो जो हँस रहा है फ़ोटो में खुलकर,
वैसे तो मैं ही हूँ, पर पूछता हूँ कौन?

फुरसत के पलों में कभी सोचना ज़रूर,
जो सब कुछ था कल तक, वो आज है कौन?

मरने को तैयार हूँ मैं किसी भी पल लेकिन,
अजनबियों के शहर में मुझे जलाएगा कौन?

शनिवार, 14 मई 2016

२१४. कांटे

एक नन्हा सा बच्चा,
अपनी धुन में मस्त 
हँसता-खिलखिलाता, 
दौड़ पड़ा बगीचे में 
उस ऊँगली को छुड़ा 
जिसने थाम रखा था उसको .

वहीँ कहीं बेपरवाही से पड़ा 
एक गुलाब का काँटा 
चुभ गया बच्चे के 
छोटे कोमल पांव में. 
बच्चा रोया, चिल्लाया,
साथ ही वह काँटा भी रोया.


कांटे ने कोसा ख़ुद को,
सोचा, चुभने से पहले 
क्यों नहीं सोचता वह 
कि कहाँ चुभना है.

बहुत कोशिश की कांटे ने,
पर निकल नहीं पाया 
बच्चे के पांव से.
उसने दूसरे कांटे से कहा,
चलो, तुम्हीं मेरी मदद करो,
निकालो मुझे बच्चे के पांव से.
जो अपराध मैंने किया है,
उसका निराकरण 
हम काँटों को ही करना है.

शनिवार, 7 मई 2016

२१३. चिता

मैं जुटा रहा हूँ लकड़ियाँ,
सजा रहा हूँ अपनी चिता,
बचा रहा हूँ उसे बारिश से,
पर मौत है कि न आती है,
न बताती है कि कब आएगी.

मुझे भी जल्दी नहीं मरने की,
बस इतनी सी फ़िक्र है 
कि अगर मैं मर गया,
तो अजनबियों के इस शहर में 
कौन मुझे श्मशान ले जाएगा,
कौन मेरी चिता सजाएगा,
कौन उसमें आग लगाएगा. 

अगर थोड़ा भी अंदेशा हो जाए,
तो अपने पैरों पर चलकर जाऊं,
अपनी चिता पर लेट जाऊं
और एक चिंगारी डाल दूं उसमें 
अपनी आख़िरी सांस के साथ.

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

२१२. खिलौने

बच्चे कई तरह के होते हैं,
खिलौनों को लेकर 
उनकी पसंद भी 
एक सी नहीं होती.

कुछ बच्चों को पसंद होता है,
खिलौने तोड़ना,
उनसे खेलना नहीं.
ऐसे कुछ बच्चे 
बड़े होकर बदल जाते हैं,
छूट जाती है उनकी 
तोड़ने की आदत.

कुछ बच्चे, 
जिन्हें पसंद होता है 
खिलौनों से खेलना,
बड़े होकर उन्हें तोड़ने लगते हैं.

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं,
जो खिलौनों से खेलते भी हैं,
उन्हें तोड़ते भी हैं.
ऐसे बच्चे जो बड़े हो जाते हैं
और जिनकी आदत नहीं बदलती, 
बहुत ख़तरनाक बन जाते हैं.

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

२११. नलका




चले गए एक-एक कर
सब-के-सब,
बस मैं बचा हूँ.

बहुत अकेलापन लगता है,
जब खिड़की पर नहीं करता 
कोई कबूतर गुटरगूं,
जब छत से लटका पंखा 
बिना आवाज़ किए 
चुपचाप चलता रहता है,
जब खुलते-बंद होते हैं 
दरवाज़े बेआवाज़,
जब चारपाई में नहीं होती 
चरमराहट,
जब हवाएं भी छोड़ देती हैं 
सरसराना...

ऐसे में अच्छा लगता है मुझे 
अपना  पानी का नलका,
जो हमेशा टप-टप कर 
बूँदें गिराता रहता है.


भाई प्लम्बर, कहीं और जाना,
मेरे घर मत आना,
नलका ठीक मत करना,
एक यही तो है, जो मेरे 
अकेलेपन का साथी है.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

२१०.बहस

बहुत हो गई बहस,
तुमने कुछ कहा,
मैंने काटा उसे,
मैंने कुछ कहा,
तुमने ग़लत ठहराया उसे.

तुम्हारी बात के पक्ष में 
सटीक तर्क थे,
मेरी बात भी 
आधारहीन नहीं थी.

बड़े-बड़े लोगों ने 
कभी-न-कभी, कुछ-न-कुछ 
कह रखा था 
मेरे समर्थन में 
और मेरे ख़िलाफ़ भी.

देखो, घंटों की बहस के बाद भी 
नतीज़ा शून्य ही रहा,
तो क्यों न बहस बंद कर दें?

सही-ग़लत का फ़ैसला करना 
इतना ज़रूरी क्यों होता है,
कभी तो निकलें इससे,
कभी तो कुछ अलग करें,
बहस नहीं, कुछ बातें करें.

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

२०९. कठपुतलियाँ



नाच रही हैं कठपुतलियाँ 
करोड़ों-अरबों एक साथ,
दिखती नहीं कोई डोर,
दिखता नहीं नचानेवाला.

ख़ुद को दर्शक समझनेवाले भी 
कोई और नहीं, कठपुतलियाँ ही हैं,
जो कभी खुश हो लेती हैं,
कभी दुःखी हो लेती हैं, 
दूसरी कठपुतलियों को देखकर. 

अपनी ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता,
पता ही नहीं चलता उन्हें 
कि वे भी कठपुतलियाँ ही हैं 
और दूसरी कठपुतलियाँ 
उनका नृत्य देख रही हैं.

तमाशे के बीच नचानेवाला 
खींच लेता है कोई डोर,
उठा लेता है कोई कठपुतली,
उतार देता है एक नई कठपुतली 
मंच पर नाचने के लिए.

इसी तरह अनवरत चलता रहता है 
कठपुतलियों का रहस्यमय नाच,
कोई नहीं जान पाता 
कि जो इन्हें नचाता है,
आख़िर क्यों नचाता है.

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

208. स्वेटर

बहुत प्यार से बुना है मैंने एक स्वेटर,
बहुत मेहनत लगी है इसमें,
ज़िन्दगी के खूबसूरत लम्हें लगे हैं,
तब जाकर बना है यह स्वेटर.

बिल्कुल फ़िट बैठेगा तुमपर,
बहुत जचोगे इसमें तुम,
बस तुमसे इतनी विनती है 
कि इसके फंदे मत देखना,
उन्हें हटाने की कोशिश मत करना.

ऐसा करोगे तो सब खो दोगे,
कुछ भी हासिल नहीं होगा,
सिर्फ़ धागे रह जाएंगे हाथ में,
जिन्हें तुम पहन नहीं पाओगे.

जब बंधन के फंदे लगते हैं,
तभी प्यार का स्वेटर बनता है.

गुरुवार, 24 मार्च 2016

२०७. इस बार की होली

बड़ी फीकी रही इस बार की होली,
न किसी ने रंग डाला, न गुलाल,
न खिड़की के पीछे छिपकर 
किसी ने कोई गुब्बारा फेंका,
न कोई भागा दूर से 
पिचकारी की धार छोड़कर,
न कोई शरारत, न ज़बरदस्ती,
ऐसी भी क्या होली!

साबुन-तेल सब धरे रह गए,
बड़ी स्वच्छ, बड़ी स्वस्थ रही 
इस बार की होली- नीरस सी,
कब आई,कब गई, पता नहीं.

होली के बाद मैं सोचता हूँ
कि इस साल मैंने दोस्त भी खोए 
और दुश्मन भी,
न दोस्तों ने होली पर याद किया,
न दुश्मनों ने होली का फ़ायदा उठाया.

शनिवार, 19 मार्च 2016

२०६.आम के बौर




अच्छे लगते हैं मुझे आम के बौर,
सुन्दर से,मासूम से, नाज़ुक से
हरे पत्तों से झांकते पीले-पीले बौर.

कुछ बौर झर जाएंगे,
फागुन की तेज़ आँधियों में
या बेमौसम की बरसात में,
पर कुछ झेल लेंगे सब कुछ,
खेल-खेल में उछाले गए पत्थर भी
और बन जाएंगे खट्टी कैरियां
या मीठे रसीले आम.

ये कमज़ोर से बौर बड़े ज़िद्दी हैं,
लड़ लेते हैं मौसम से,
रह लेते हैं ज़िन्दा,
संभावनाओं से भरे होते हैं,
इसलिए बहुत अच्छे लगते हैं.

शनिवार, 5 मार्च 2016

२०५. छोटी-सी ख़ुशी

ठंडी-ठंडी सुबहों में घुल गई है 
हल्की-सी गर्माहट,
जैसे किसी उदास चेहरे पर 
छा जाए थोड़ी-सी मुस्कराहट.
जैसे घुप्प अँधेरे में दिख जाए 
हल्की-सी किरण,
जैसे मनहूस ख़बरों के बीच 
आ जाए कोई शुभ समाचार.
जैसे उजाड़ बगीचे में
खिल जाए कोई खूबसूरत फूल,
जैसे सूखे पेड़ पर 
निकल आए कोई हरा पत्ता. 

छोटी-सी ख़ुशी जो ज़रूरत पर मिले 
बड़ी ख़ुशी से ज़्यादा अच्छी लगती है. 

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

२०४. नींद

मेरी आँखें खुली हैं,
पर मैं नींद में हूँ,
चल रहा हूँ,
मंज़िल से भटक रहा हूँ,
पर नींद है कि टूटती नहीं,
कोई झकझोरे तो भी नहीं.

आँखें खुली हों,
फिर भी जो नींद में हो,
उसे पता होना ज़रूरी है 
कि वह नींद में है,
यह जागने की पहली शर्त है.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

२०३. इंसान और कुत्ता

न जाने क्यों
आजकल इंसान
कुत्तों जैसे बनना चाहते हैं.

वे आदमियों की तरह नहीं,
कुत्तों की तरह लड़ते हैं,
उन्हीं की तरह जीभ लपलपाते हैं,
सुविधाओं के बदले
कोई पट्टे से बांधे
तो बेहिचक बंध जाते हैं.

इंसान ने कुत्तों से
बहुत कुछ सीखा है,
सिवाय वफ़ादारी के,
मौक़ा मिलते ही
एक इंसान दूसरे को
कुत्ते की तरह काट खाता है.

इंसान ने बहुत सारी बुराइयाँ
कुत्तों से सीख ली हैं,
पर अपनी बुराइयाँ नहीं छोड़ीं,
दरअसल अब इंसान
न इंसान रहा, न कुत्ता.

शनिवार, 30 जनवरी 2016

२०२. चट्टान


मैं रास्ते पर पड़ा 
कोई कंकड़ नहीं 
कि तुम ठोकर मारो,
दूर फेंक दो मुझे
और अपने होंठों पर 
विजयी मुस्कान लिए 
आगे बढ़ जाओ.

मैं चट्टान हूँ,
मुझे ठोकर मारोगे 
तो चोट ही खाओगे,
नहीं होगा मेरा 
कोई बाल भी बांका,
मैं टिका रहूँगा 
बिना हिले 
वहीँ का वहीँ,
तुम्हारा रास्ता रोके.

मुझसे टकराना है 
तो दलबल के साथ आओ,
छैनी-हथौड़ों के साथ आओ,
गोला-बारूद के साथ आओ,
मुझे दबाना है 
तो दमन की तैयारी के साथ आओ. 

शनिवार, 23 जनवरी 2016

२०१. शुरुआत

बहुत उजाला है यहाँ,
दिए यहाँ बेबस लगते हैं,
पता ही नहीं चलता 
कि वे जल रहे हैं.

यहाँ दियों का क्या काम,
चलो, समेटो यहाँ से दिए,
खोजते हैं वे झोपड़ियाँ,
वे गली-कूचे, वे कोने,
जहाँ घुप्प अँधेरा है,
जहाँ दियों की ज़रूरत है.

एक-एक दिया भी जलाएंगे वहां,
तो शुरुआत के लिए बहुत होगा.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

२००. प्रेम कविता

मैं नहीं चाहता 
कि कोई जाने 
तुम्हारे बारे में,
हमारे बारे में 
और इस बारे में 
कि तुम मेरे लिए क्या हो.

उस चाहत का,
जिससे लोग अंजान हों,
मज़ा ही कुछ और है,
जैसे दो किनारे साथ-साथ 
मीलों तक चलते रहें 
और नदी को पता भी न चले.

सुनो, कोई नहीं जानता 
कि सालों पहले मैंने 
जो कविता लिखी थी,
वह दरअसल एक प्रेम कविता थी 
और उसकी पंक्तियों के बीच 
मैंने तुम्हें कहीं छिपाया था.

बहुत चर्चा हुई उस कविता की,
बहुत सराहा उसे लोगों ने,
पर नहीं खोज पाए तुम्हें.

सिर्फ़ मुझे पता था 
कि वह एक प्रेम कविता थी 
और उसकी पंक्तियों के बीच 
मैंने जिसे छिपाया था,
वह कोई और नहीं,
तुम थी.

शनिवार, 9 जनवरी 2016

१९९. लड़ाकू विमान

सैनिक दफ़्तरों के आगे 
दिख जाते हैं कहीं-कहीं
बड़े-बड़े लड़ाकू विमान,
असली, पर उड़ने में अक्षम.

कभी जो बातें करते थे हवा से,
बरसाते थे गोले,
अब चल-फिर भी नहीं सकते,
चुपचाप बेचारे से खड़े हैं,
नुमाइश की चीज़ बने बैठे हैं.

कभी-कभार उन पर बैठ जाती है 
थकी-मांदी कोई चिड़िया,
थोड़ी देर सुस्ताती है,
फिर उड़ जाती है 
और वहीँ का वहीँ रह जाता है 
वह विशालकाय लड़ाकू विमान.

दरअसल कोई कितना ही 
बड़ा लड़ाका क्यों न हो,
एक दिन बंद हो ही जाता है 
उसका उड़ना.

शनिवार, 2 जनवरी 2016

१९८. नया साल


एक बार फिर आ गया नया साल,
एक बार फिर से हम नाचे,
फिर से मनाईं खुशियाँ,
फिर से की आतिशबाजी,
फिर से किए संकल्प.

नए साल के संकल्प 
पुराने थे, बासी थे,
हमने पहले भी किए थे,
पिछले साल, हर साल,
जो पूरे नहीं हुए,
हमने पूरे किए ही नहीं,
पूरा करने की कोशिश ही नहीं की.

मैं सोचता हूँ 
कि कैसे हो जाते हैं हम 
नए साल की शुरुआत में 
इतने बेशर्म,
कैसे विदा कर देते हैं 
पुराने साल को 
इतना खुश होकर,
जैसे कि हमने 
पूरा उपयोग किया हो उसका,
पूरा न्याय किया हो उसके साथ.