शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

865. कौवे का इंतज़ार




     


जब कभी कोई कौवा 

उसके घर की मुंडेर पर 

कांव-कांव करता है,

बहुत ख़ुश  हो जाती है 

वह अकेली महिला। 


बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

आलू-मटर की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है 

उसके कमरे का कोना-कोना । 


जब कभी आ जाता है

घर उसका बेटा,

तो कौवे की कांव-कांव में 

बढ़ जाता है उसका भरोसा । 


कौवे को नहीं मालूम 

कि कितनी बेसब्री से 

उसका इंतज़ार करती है 

किसी घर में कोई माँ,

कितनी मीठी लगती है उसको 

कौवे की कांव-कांव। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक रचना! कुछ पलों का सुकून तो पा ही लेती है माँ जब वह नहीं भी आता

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 23 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

    आमंत्रण की सूचना में देरी के लिये क्षमा।

    जवाब देंहटाएं