जब कभी कोई कौवा
उसके घर की मुंडेर पर
कांव-कांव करता है,
बहुत ख़ुश हो जाती है
वह अकेली महिला।
बनाने लगती है
अपने बेटे के लिए
बेसन के लड्डू,
आलू-मटर की सब्ज़ी,
झाड़ने लगती है
उसके कमरे का कोना-कोना ।
जब कभी आ जाता है
घर उसका बेटा,
तो कौवे की कांव-कांव में
बढ़ जाता है उसका भरोसा ।
कौवे को नहीं मालूम
कि कितनी बेसब्री से
उसका इंतज़ार करती है
किसी घर में कोई माँ,
कितनी मीठी लगती है उसको
कौवे की कांव-कांव।
सुंदर
जवाब देंहटाएंमार्मिक रचना! कुछ पलों का सुकून तो पा ही लेती है माँ जब वह नहीं भी आता
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 23 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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आमंत्रण की सूचना में देरी के लिये क्षमा।