शुक्रवार, 26 मार्च 2021

५४८. होली में



यह कैसा चमत्कार हुआ,

उसने रंग तो सूखा लगाया,

पर मैं भीग गया अंदर तक.

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खिड़की से उसने गुब्बारा फेंका,

निशाना चूक गया,

पर घायल हो गया मैं. 

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इस बार पिचकारी बड़ी लेना,

भर लेना उसमें प्यार के रंग 

चलाना मुझ पर उम्र भर . 

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तुमने जो गुझिया खिलाई,

उसमें चीनी ज़रा कम थी,

पर  मीठी वह बहुत थी. 

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होली पर मैंने रंग लगाया,

तुम बहुत गुस्सा हुई,

मैं ख़ुश हूँ कि तुमने 

मेरी अनदेखी नहीं की. 

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आओ, होली में गले मिलते हैं,

बेमन से ही सही,

शुरुआत तो करें. 


गुरुवार, 25 मार्च 2021

५४७.जनहित


मैं किसी के रोने से 

उतना नहीं डरता,

जितना उसके 

सिसकने से डरता हूँ. 


रोने को दबाने से 

सिसकी निकलती है, 

सिसकनेवाला आदमी 

ख़तरनाक हो सकता है,

दूसरों के लिए भी 

और अपने लिए भी. 


सिसकनेवाले आदमी को 

रोने के लिए उकसाना 

जनहित का काम है. 

शनिवार, 20 मार्च 2021

५४६. शिकायत


पिता, मुझे नहीं पता था
कि तुम निकल पड़ोगे यात्रा पर,
मैं दौड़ा- दौड़ा गया स्टेशन तक,
तुम्हारी गाड़ी आ चुकी थी,
तुम बैठ चुके थे डिब्बे में,
मैंने खिड़की से झाँककर देखा,
तुमने हाथ हिलाया, ट्रेन चल दी.

पिता, क्या ऐसे भी कोई जाता है,
बिना कोई इत्तला दिए,
बिना कोई बातचीत किए,
ख़ासकर तब, जब यात्रा अंतिम हो.

बुधवार, 17 मार्च 2021

५४५. दाँत

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यह न समझना
कि तुम्हारी जीभ
तुम्हारे मुँह में है,
तो सुरक्षित है. 


बड़ी कोमल है,
बड़ी नादान है,
बड़ी मासूम है
तुम्हारी जीभ. 


ताक में बैठे हैं
तुम्हारे बत्तीस दाँत,
मौक़ा मिलते ही
टूट पड़ेंगे उसपर.

 
बाहरवाले नहीं,
तुम्हारी जीभ को
काट खाएंगे
तुम्हारे अपने ही दाँत।

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

५४४. मिट्टी

 


मैंने मिट्टी को रौंदा,

और आगे बढ़ने लगा,

पाँवों से चिपक गई वह,

कहा, मुहब्बत है तुमसे.


मैंने उसे हाथों में उठाया,

सहलाया उसे प्यार से,

रंग भरे उसमें,

बहुत ख़ुश हुई मिट्टी,

उसने मुझे खिलौने दिए.

बुधवार, 10 मार्च 2021

५४३. चुप्पी

मेरी बातें 

तुम्हें बुरी लगती हैं,

तो कहो.


बहस करो,

चीख़ो-चिल्लाओ,

झगड़ा करो,

पर चुप न रहो.


बहुत खलती है मुझे चुप्पी,

बड़ी डरावनी होती है यह,

रिश्तों के टूटने का ख़तरा 

बहुत ज़्यादा होता है चुप्पी में.


शनिवार, 6 मार्च 2021

५४२. बंधन


वे जो पराये लगते थे,

दूर नहीं हैं,

वे जो सख्त लगते थे,

पत्थर नहीं हैं,

वे जो चुप रहते थे,

गूंगे नहीं हैं,

वे जो अनदेखा करते थे,

अंधे नहीं हैं.


ध्यान से देखो,

किसी और ने नहीं 

बाँध रखा है 

तुमने ख़ुद को.


खोल दो बंधन,

फैला दो बाहें,

फिर देखो, 

कैसे बदल जाती है 

तुम्हारी यह बदरंग दुनिया?

गुरुवार, 4 मार्च 2021

५४१. पेड़ काटनेवाले



पेड़ कट रहे हैं,

कट रहे हैं काटनेवाले,

पर नहीं सुनी उन्होंने 

ख़ुद के कटने की आवाज़,

महसूस नहीं किया थोड़ा भी 

ख़ुद के कटने का दर्द.


पागल हो जाते हैं वे 

जिनके पास कुल्हाड़ियाँ होती हैं,

कुछ नहीं सुनता उन्हें,

कुछ महसूस नहीं होता. 


एक दिन जब पेड़

धराशाई हो जाएंगे

और बंद हो जाएंगी 

कटने की आवाज़ें,

तब महसूस होगा काटनेवालों को 

कि उन्होंने पेड़ों को नहीं 

ख़ुद को काटा था.


सोमवार, 1 मार्च 2021

५४०.मंज़िल


बहुत दिनों बाद 

आज अवसर आया है 

कि प्लेटफ़ॉर्म पर हूँ.


घंटी हो चुकी है,

ट्रेन बस पहुँचने ही वाली है,

पर अब जब रवानगी पास है,

तो दिल बहुत उदास है.


सोचता हूँ,

कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है,

वह ट्रेन जो पहुँचने ही वाली है,

मुझे मंज़िल तक ले जाएगी 

या मंज़िल से दूर?