रविवार, 7 जून 2026

858.अधिकार और कर्तव्य

 


वह चलता जाता था 

काँटों-भरी राह पर नंगे पैर,

कभी तेज़ धूप में,

कभी गहरे अंधेरे में। 


लड़खड़ा जाता था कभी-कभी,

पर मैं उसके कंधों पर 

बेफ़िक्र बैठा रहता था,

जानता था कि वह 

गिरने नहीं देगा मुझे । 


मैंने महसूस नहीं किए 

उसके पाँव के छाले,

उसकी फूलती साँसे,

उसकी दुखती पीठ। 


पहली बार मैंने महसूस किया 

उसका प्रेम, उसका दर्द,

जब कोई बैठ गया आकर 

मेरे कंधों पर। 


वह जो कंधों पर उठाता है,

कर्तव्य समझता है अपना, 

पर जो कंधों पर बैठता है, 

इसे कुछ नहीं समझता 

अपने हक़ के सिवा। 



2 टिप्‍पणियां:

  1. जो कंधों पर बिठाता है मात्र कर्त्तव्य नहीं समझता, प्रेम से उपजा सहज कर्त्तव्य भले समझ ले, और जो बैठता है वह हक़ वहीं समझ सकता है जहाँ उसे प्रेम की सुगंध आती है

    जवाब देंहटाएं
  2. जीवन के कुछ रिश्तों का यही सच है।
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति सर।
    सादर।
    ---------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ९ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं