गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

872. लड़ाइयाँ

 


मैं बीवी से लड़ा,

बच्चों से लड़ा, 

परिवार से लड़ा,

पड़ोसियों से लड़ा। 


मैं मुहल्ले से लड़ा,

शहर से लड़ा,

देश से लड़ा,

दुनिया से लड़ा। 


मैं भूल गया 

ख़ुद  से लड़ना,

ख़ुद से लड़ा होता,

तो मुझे नहीं लड़नी पड़तीं

इतनी सारी लड़ाइयाँ। 




3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना "अहंकार और दूसरों से संघर्ष" के बजाय "आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार" को जीवन की वास्तविक शांति का मार्ग बताती है।
    बहुत सुंदर
    सादर
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. व्वाहहहहहह
    लड़ने में भी भूल हो जाती है
    आभार
    सादर

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