रविवार, 29 मार्च 2026

849. युद्ध के दिनों में

 


जानता हूँ तुम्हें 

नौ महीने हो गए गर्भ में, 

पर छटपटाओ मत,

हो सके, तो अंदर ही रहो,

बाहर हवा ज़हरीली है,

ड्रोन, बम और मिसाइलें 

तुम्हारे इंतज़ार में हैं। 

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एक ऐसा युद्ध करते हैं,

जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,

तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,

बंदूकों से निकले इत्र,

सिपाही खुरचकर मिटा दें 

मुल्कों के बीच खींची लकीरें। 


2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद गहन अर्थ लिए मर्म छूती भावपूर्ण अभिव्यक्ति।
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ३१ मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं