इन
दिनों अजीब सा लगता है वह कमरा।
आवाज़ें
आती हैं उससे,
पर
ग़ायब है
वह
जानी-पहचानी बुलंद-सी आवाज़,
हँसता
है कोई उसमें कभी-कभी,
पर
उदास लगता है वह कमरा।
खिड़की-रोशनदान
तो हैं उसमें,
पर
धूप है कि ठिठक जाती है,
हवा
है कि फंस के रह जाती है।
रोज़
सफ़ाई होती है उसकी,
पर
धूल है कि हटती ही नहीं,
चमकती
है वहाँ रखी हुई चीज़ें,
पर
साफ़ नहीं लगतीं पहले-सी।
बिस्तर
भी है वहाँ,
अलमारी भी,
कुर्सी
भी है,
तिपाई भी,
पर
खाली-खाली सा लगता है,
वह
अकेला उदास कमरा।
कुछ
हो गया है उसे अचानक,
बीमार-सा
लगता है वह इन दिनों,
कभी
जो अपनी ओर खींचता था,
अब
काटने को दौड़ता है वह कमरा।
ये कविता पढ़कर मन बहुत देर तक उसी कमरे में अटका रह जाता है। ऐसा लगता है जैसे कमरा नहीं, कोई अपना इंसान बीमार हो गया हो। आवाज़ें हैं, सामान है, रोशनी भी है, पर जो जान थी वो कहीं खो गई है।
जवाब देंहटाएंशुभकामनाएं नववर्ष पर |
जवाब देंहटाएंनववर्ष की शुभकामनायें...क्या खूब लिखा है ..रोज़ सफ़ाई होती है उसकी,
जवाब देंहटाएंपर धूल है कि हटती ही नहीं...वाह
अत्यन्त सुन्दर सृजन । नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.
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