बुधवार, 7 अप्रैल 2021

५५१.शिव से




शिव,

समय आ गया है 

कि तुम गंगा को 

फिर से जटाओं में समेट लो. 


गंगा ही क्यों,

और भी बहुत सी नदियाँ हैं,

जो मर रही हैं,

तुम्हारी जटाओं की 

सुरक्षा चाहती हैं. 


शिव,

सब को पनाह दो,

बचा लो मृतप्राय नदियों को 

और अपनी जटाओं को 

तब तक मत खोलना,

जब तक तुम्हें यक़ीन न हो जाय 

कि तुम्हारी जटाओं से निकलकर 

नदियाँ सुरक्षित रहेंगी. 

10 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 09-04-2021) को
    " वोल्गा से गंगा" (चर्चा अंक- 4031)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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  2. हम इंसान तो सब बिगाड़ने का ही काम करते । जो प्राप्त है उसे बेदर्दी से इस्तेमाल कर खत्म होने की कगार पर पहुंचा देते । बहुत सही लिखा है ।

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  3. वाह! ओंकार जी सुंदर और सटीक ।

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  4. नदियों को पुनर्जीवित करना होगा वरना एक दिन वे वाकई लुप्त हो जाएंगी शिव की जटाओं में

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  5. सही कहा नदियाँ मरती जा रही हैं

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  6. सूखती,सिसकती, नदियों सुंदरके लिए भावों का अनूठा समर्पण ।

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