शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

२४५.गुठली




चूसकर फेंकी गई जामुन की एक गुठली 
नरम मिट्टी में पनाह पा गई,
नन्ही-सी गुठली से अंकुर फूटा,
बारिश के पानी ने उसे सींचा,
हवा ने उसे दुलराया.

धीरे-धीरे एक पौधा,
फिर पेड़ बन गई 
जामुन की वह छोटी-सी गुठली,
चूसनेवाले बेख़बर रहे.

अब हज़ारों-लाखों जामुनों से,
लदा है यह विशाल पेड़,
आ पहुंचे हैं पेड़ के आस-पास
अब फिर से वही लोग,
जिन्होंने कभी जामुन को चूसकर 
बेरुख़ी से कहीं फेंक दिया था. 

शनिवार, 21 जनवरी 2017

२४४. वे महिलाएं

बल्लियों के सहारे,
सिर पर बोझ लिए,
आसमान की ओर 
धीरे-धीरे बढ़ती 
दुबली-पतली महिलाओं को देखकर 
मुझे बड़ा डर लगता है.

कहीं बल्ली टूट गई तो,
कहीं पैर फ़िसल गया तो,
बुरे-बुरे ख्याल 
मन में आते हैं.

और उस वक़्त तो 
मेरा दिल धक्क से रह जाता है,
जब वे अपनी गरदन को 
हल्का-सा मोड़कर 
मुस्करा देती हैं.

शनिवार, 14 जनवरी 2017

२४३. जाड़े की धूप


दिसम्बर की कंपकंपाती ठण्ड में,
जब निकलता है सूरज,
तो आ जाती है जान में जान,
बहुत सुहाता  है अकड़े बदन पर 
धूप का स्पर्श,
शायद यही होता है स्वर्ग.

शिव, अपना तीसरा नेत्र खोलो,
तो कुछ ऐसे देखना 
कि जल जाय एक-एक कर सब कुछ,
पर बची रह जाय आख़िर तक 
जाड़े की यह गुनगुनी धूप.

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

२४२. गाँव का स्टेशन




मैं गाँव का स्टेशन,
अकेला, अनदेखी का मारा,
पटरियां गुज़रती हैं मेरे सामने से,
गाड़ियाँ सरपट दौड़ जाती हैं,
मैं बस देखता रह जाता हूँ.

दिनभर में एकाध पैसेंजर 
हालचाल पूछ लेती है रूककर,
फिर निकल जाती है आगे,
मेरा प्लेटफ़ॉर्म सूना रह जाता है.

ओ राजधानी, रोज़ नहीं,
तो कभी-कभी ही रुक जाया करो,
दुआ-सलाम कर लिया करो,
यात्री चढ़ाने-उतारने के लिए नहीं,
तो क्रॉसिंग के लिए ही सही,
तकनीकी ख़राबी के बहाने ही सही,
पांच साल में एक बार ही सही,
जैसे चुनाव के दिनों में कभी-कभी 
राजधानीवाले गाँव चले आते हैं.