शनिवार, 30 अप्रैल 2016

२१२. खिलौने

बच्चे कई तरह के होते हैं,
खिलौनों को लेकर 
उनकी पसंद भी 
एक सी नहीं होती.

कुछ बच्चों को पसंद होता है,
खिलौने तोड़ना,
उनसे खेलना नहीं.
ऐसे कुछ बच्चे 
बड़े होकर बदल जाते हैं,
छूट जाती है उनकी 
तोड़ने की आदत.

कुछ बच्चे, 
जिन्हें पसंद होता है 
खिलौनों से खेलना,
बड़े होकर उन्हें तोड़ने लगते हैं.

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं,
जो खिलौनों से खेलते भी हैं,
उन्हें तोड़ते भी हैं.
ऐसे बच्चे जो बड़े हो जाते हैं
और जिनकी आदत नहीं बदलती, 
बहुत ख़तरनाक बन जाते हैं.

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

२११. नलका




चले गए एक-एक कर
सब-के-सब,
बस मैं बचा हूँ.

बहुत अकेलापन लगता है,
जब खिड़की पर नहीं करता 
कोई कबूतर गुटरगूं,
जब छत से लटका पंखा 
बिना आवाज़ किए 
चुपचाप चलता रहता है,
जब खुलते-बंद होते हैं 
दरवाज़े बेआवाज़,
जब चारपाई में नहीं होती 
चरमराहट,
जब हवाएं भी छोड़ देती हैं 
सरसराना...

ऐसे में अच्छा लगता है मुझे 
अपना  पानी का नलका,
जो हमेशा टप-टप कर 
बूँदें गिराता रहता है.


भाई प्लम्बर, कहीं और जाना,
मेरे घर मत आना,
नलका ठीक मत करना,
एक यही तो है, जो मेरे 
अकेलेपन का साथी है.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

२१०.बहस

बहुत हो गई बहस,
तुमने कुछ कहा,
मैंने काटा उसे,
मैंने कुछ कहा,
तुमने ग़लत ठहराया उसे.

तुम्हारी बात के पक्ष में 
सटीक तर्क थे,
मेरी बात भी 
आधारहीन नहीं थी.

बड़े-बड़े लोगों ने 
कभी-न-कभी, कुछ-न-कुछ 
कह रखा था 
मेरे समर्थन में 
और मेरे ख़िलाफ़ भी.

देखो, घंटों की बहस के बाद भी 
नतीज़ा शून्य ही रहा,
तो क्यों न बहस बंद कर दें?

सही-ग़लत का फ़ैसला करना 
इतना ज़रूरी क्यों होता है,
कभी तो निकलें इससे,
कभी तो कुछ अलग करें,
बहस नहीं, कुछ बातें करें.

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

२०९. कठपुतलियाँ



नाच रही हैं कठपुतलियाँ 
करोड़ों-अरबों एक साथ,
दिखती नहीं कोई डोर,
दिखता नहीं नचानेवाला.

ख़ुद को दर्शक समझनेवाले भी 
कोई और नहीं, कठपुतलियाँ ही हैं,
जो कभी खुश हो लेती हैं,
कभी दुःखी हो लेती हैं, 
दूसरी कठपुतलियों को देखकर. 

अपनी ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता,
पता ही नहीं चलता उन्हें 
कि वे भी कठपुतलियाँ ही हैं 
और दूसरी कठपुतलियाँ 
उनका नृत्य देख रही हैं.

तमाशे के बीच नचानेवाला 
खींच लेता है कोई डोर,
उठा लेता है कोई कठपुतली,
उतार देता है एक नई कठपुतली 
मंच पर नाचने के लिए.

इसी तरह अनवरत चलता रहता है 
कठपुतलियों का रहस्यमय नाच,
कोई नहीं जान पाता 
कि जो इन्हें नचाता है,
आख़िर क्यों नचाता है.

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

208. स्वेटर

बहुत प्यार से बुना है मैंने एक स्वेटर,
बहुत मेहनत लगी है इसमें,
ज़िन्दगी के खूबसूरत लम्हें लगे हैं,
तब जाकर बना है यह स्वेटर.

बिल्कुल फ़िट बैठेगा तुमपर,
बहुत जचोगे इसमें तुम,
बस तुमसे इतनी विनती है 
कि इसके फंदे मत देखना,
उन्हें हटाने की कोशिश मत करना.

ऐसा करोगे तो सब खो दोगे,
कुछ भी हासिल नहीं होगा,
सिर्फ़ धागे रह जाएंगे हाथ में,
जिन्हें तुम पहन नहीं पाओगे.

जब बंधन के फंदे लगते हैं,
तभी प्यार का स्वेटर बनता है.