शनिवार, 24 मार्च 2012

२७. आओ, हंसें


बहुत दिन हो गए हँसे,
आओ, आज तोड़ दें बंधन,
भुला दें शिकवे-शिकायतें,
निकाल फेंकें मन का गुबार,
निहारें काँटों के बीच खिले फूल,
याद करें  पुराने मीठे पल.


आओ, आज खुलकर हंसें,
ऐसे कि पागलों से लगें,
कि आंसू आ जाय आँखों में,
कि लोग देखें मुड़-मुड़ कर,
जैसे कि बाढ़ आ जाय 
किसी गुमसुम नदी में अचानक.


आओ, आज खूब हंसें,
हँसते रहें सुबह से शाम तक,
जैसे आज हमें मरना हो.

शनिवार, 17 मार्च 2012

२६.निशाना


तुम्हें पता है न 
कि रंगीन पानी से भरा गुब्बारा,
जो तुम पिछले साल
खिड़की से फेंक कर भाग गई थी,
सड़क पर गिरकर बेकार हो जाता
अगर मैं लपककर पकड़ न लेता
और अपने सरपर फोड़ न लेता.


इस बार होली में
इस तरह फेंकना गुब्बारा
कि मुझपर आकर फूटे 
या जिसे मैं लपक सकूँ
आसानी या मुश्किल से 
और कर सकूँ
तुम्हारा प्रयास सार्थक.


भगवान न करे 
कि तुम्हारा निशाना कभी चूके,
खासकर तब जब निशानेपर मैं होऊं 
और तुम्हारा मकसद मुझे रंगना हो.


गुरुवार, 8 मार्च 2012

२५. इस बार की होली 


बहुत देर खड़ा रहा मैं
तुम्हारी खिड़की के नीचे,
पर न तुमने खिड़की खोली,
न गुब्बारा फेंका.


बड़ा इंतज़ार था होली का,
पर तुम्हारी बेरुखी ने 
पानी फेर दिया उम्मीदों पर
और मुझे पता भी नहीं 
कि बेरुखी कि वज़ह क्या थी.


बड़ी फीकी रही इस साल की होली,
बहुत डला अबीर-गुलाल,
पर मैं रँगा ही नहीं,
बहुत पड़े गुब्बारे,
पर मैं भीगा ही नहीं.

रविवार, 4 मार्च 2012

२४.शहर की सड़कें


शहर की चौड़ी-चमचमाती सड़कें
लगातार फुट-पाथों को लीलतीं
ताकि बढाई जा सकें लेनें
और गाड़ियाँ दौड़ सकें सरपट.


मीलों लम्बे flyover
छलांगों में पार कर रहे चौराहे,
चिढ़ा रहे नीचे जलती-बुझती
बेबस-सी लाल बत्तियों को.


एक बूढ़ा थका-सा, बदहवास,
निढाल निरंतर कोशिश से
कि सड़क के उस पार पहुँच जाय,
जहाँ पिछले आधे घंटे से
उसका परिवार इंतज़ार में खड़ा है.