सुनो सीता,
अच्छा होता,
अगर रावण से युद्ध आज होता,
न उतना समय लगता,
न उतना कष्ट होता।
न कहीं जाने की ज़रूरत होती,
न बंदर-भालू इकट्ठा करने की,
न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता,
बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं।
जला देते लंका बिना हनुमान के,
गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,
चुपके से गिरा देते वहाँ बम,
मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।
वाक़ई मर्यादहीन हो गई है आज सत्ता
जवाब देंहटाएंसटीक
जवाब देंहटाएंअनूठी कल्पना सोचने को मजबूर करती।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ७ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सामयिक और सार्थक सृजन
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंअब युद्ध अंतिम विकल्प नहीं होते ।
जवाब देंहटाएंभाई, आपकी ये कविता एकदम सीधा दिल और दिमाग दोनों पर असर करती है। आपने पुराने समय और आज की दुनिया को जिस तरह टकराया है, वो सोचने पर मजबूर करता है। मिसाइल और आधुनिक युद्ध की बात करके आपने बहुत सटीक कटाक्ष किया है।
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