शुक्रवार, 25 जून 2021

५८३. ठूँठ



आओ चलें,

थोड़ी देर बैठें 

उस पेड़ पर,

जिसका साथ छोड़ दिया है 

पत्तों ने,फूलों ने,

जिसकी जड़ें अब 

सूखने लगी हैं,

जिसके पास देने को 

कुछ भी नहीं बचा,

छाया भी नहीं. 


आओ,बैठें 

किसी सूखी डाली पर,

जीवंत कर दें ठूँठ को,

महसूस करें 

कि इस डाली से उस डाली तक 

फुदकने में अब 

कोई बाधा नहीं है,

पत्तों की भी नहीं. 


10 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (२७-0६-२०२१) को
    'सुनो चाँदनी की धुन'(चर्चा अंक- ४१०८ )
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. वाह !!
    बहुत खूब अहसास और उनको बड़ी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है । बधाई हो ।

    सादर

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  3. आओ बैठें उसकी सूखी डाली पर
    और सुनें अतीत की यादों का संगीत
    सुन्दर रचना

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  4. बहुत ही सुंदर सृजन गहन चिंतन लिए।
    सादर

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  5. आओ,बैठें

    किसी सूखी डाली पर,

    जीवंत कर दें ठूँठ को,
    बहुत ही गहन भाव लिए लाजवाब सृजन।
    वाह!!!

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  6. कहीं कोई बाधा नहीं है । इसमें भी सकारात्मकता का भाव। ।
    बहुत सुंदर ।

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  7. एक सूखे पेड़ से भी प्रेरणा दे गयी आपकी सुंदर रचना।

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