कविताएँ
मंगलवार, 31 मार्च 2020
४१६. शोर
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एक पंछी उड़ते हुए आया, मेरी खिड़की पर बैठा, पूछा,'पिंजरे में कैसा लगता है?' मैंने कोई जवाब नहीं दिया, उसने हँसते हुए पूछा, ...
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शनिवार, 28 मार्च 2020
४१५. पंछी बनकर देखें
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थोड़े दिन के लिए चलो,पंछी बनकर देखें, मुँह अँधेरे उठ जायँ, चहकें साथ मिलकर, डाली-डाली, पेड़-पेड़ फुदकें, जहाँ मर्ज़ी बैठें, उड़ान भरें ...
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गुरुवार, 26 मार्च 2020
४१४. खटिया
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वह जो खटिया तुमने आँगन के कोने में रखी है, धूप में तपती है, बारिश में भीगती है. निवारें फट रही हैं उसकी, पाए टूट रहे हैं, हवा से च...
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मंगलवार, 24 मार्च 2020
४१३. लॉकडाउन में किताबें
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सालों बाद ख़ुश हैं अलमारी में रखी किताबें, शायद कोई निकालेगा उनको, शायद धूल झड़ेगी उनकी. बुकमार्क काम आएगा शायद, पलटे जाएंगे किताबों...
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शनिवार, 21 मार्च 2020
४१२. बेटियां
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कच्ची कैरी-सी, इमली-सी, गोलगप्पे के चटपटे पानी-सी, दोने में रखी झालमुड़ी-सी, झाड़ियों में लगे खट्टे-मीठे बेर-सी, पेड़ पर पड़े झूले-सी,...
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