कविताएँ

शुक्रवार, 20 जून 2014

१३०. आजकल

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आजकल मैं कभी-कभी  तुम्हारे बिस्तर पर लेट जाता हूँ, मुझे लगता है, मेरी बगल में,  मेरे साथ, तुम भी लेटे हो,  चुपचाप... मैं जब तुम्हारे ...
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शुक्रवार, 13 जून 2014

१२९. सूरज

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पेड़ों के पीछे से झांकता सूरज कितना अच्छा लगता है माँ ! देखो, पत्ते हिल रहे हैं, जैसे रोक लेना चाहते हों  सूरज की हर किरण, पर सूर...
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शनिवार, 31 मई 2014

१२८. पानी सूरज से

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मत सोखो मुझे, यहीं मिट्टी में बहने दो, प्यासे होंठों को मेरी ज़रूरत है, बीज प्रस्फुटित होंगे मुझसे, हरियाली को मेरी ज़रूरत है. मुझे ...
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रविवार, 25 मई 2014

१२७. आह्वान

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बूंदों, आओ, बरस जाओ, दूर कर दो ताप धरती का, प्यासों की प्यास बुझा दो. हर गांव, हर शहर, हर जाति, हर धर्म, स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े ...
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शनिवार, 17 मई 2014

१२६. नदी

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बहुत बह चुकी मैं हरे-भरे मैदानों में, खेल चुकी छोटे-सपाट पत्थरों से, देख चुकी हँसते-मुस्कराते चेहरे, पिला चुकी तृप्त होंठों को पानी. ...
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