कविताएँ
बुधवार, 31 जुलाई 2013
९१.बचपन
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कितना अच्छा होता है बचपन, न कोई चिंता,न कोई फ़िक्र, न कोई बोध अपमान का, जो घर बना ले मन में, न कोई घृणा का भाव, जो खाता रहे खुद को ही,...
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शनिवार, 20 जुलाई 2013
९०. गृहिणी और भाजी
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गृहिणी के बटुए में रखे हैं कुछ फटे-पुराने नोट और चिल्लर, बाज़ार आई है गृहिणी भाजी खरीदनी है उसे. पूरा बाज़ार घूमेगी गृहिणी, दाम पूछ...
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शनिवार, 13 जुलाई 2013
८९.मेले में कविता
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मेले में बहुत कुछ होता है, तरह-तरह के नज़ारे - चूड़ियाँ,सलवार-दुपट्टे, सुन्दर-सुन्दर खिलौने, झूलों पर झूलते लोग, जलेबियां और समोसे, ...
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रविवार, 7 जुलाई 2013
८८. नफ़रत और प्यार
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चलो, तुमसे कह ही देता हूँ कि मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ, जैसे कभी साफ़-साफ़ कहा था कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, पर तुम परेशान मत होना, ...
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शनिवार, 29 जून 2013
८७. दिल और ज़बान
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बहुत अजीब लगता है, जब कोई कहता है कि वह ज़बान का कड़वा, पर दिल का बहुत साफ़ है. क्या महत्व है इसका कि कोई दिल का कैसा है? क्या मतल...
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