सोमवार, 14 सितंबर 2026

867. 15 सितंबर

 

हिन्दी आज उदास है,

कल ही तो आई थी वह,

गाजे-बाजे से स्वागत हुआ था उसका,

आज निकाल दी गई घर से। 


हर साल धोखा खाती है वह,

हर साल चली आती है बुलावे पर,

बस एक दिन की पूछ होती है,

फिर बेघर कर दिया जाता है उसे। 


चारा भी क्या है हिन्दी के पास,

कोई और ठौर नहीं है उसका,

उसका परिवार,उसके बच्चे सब यहीं हैं,

यहीं है उसकी ज़िंदगी। 


इसी उम्मीद में जी रही है हिन्दी

कि शायद कभी पसीजे अपनों का दिल,

शायद कभी अपने घर में मिले 

उसे अपना कोई कोना।