जीतू मुंडा,
मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए
अपनी बहन को मरते देखना,
उसे क़ब्र में लिटाना,
उसके शव पर मिट्टी डालना,
फिर कोई जंगली फूल चढ़ाना।
ऐसा करते वक़्त
तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा
कि तुम्हें कभी निकालना होगा
क़ब्र से उसका कंकाल।
कैसे चले होगे तुम
बहन को कांधे पर लादे,
कितनी दूर जाना पड़ा होगा तुम्हें,
ज़्यादा भारी रहा होगा
उसके शव से उसका कंकाल।
जीतू मुंडा,
यहाँ मुश्किल है ज़िंदा लोगों के लिए
ख़ुद को ज़िंदा साबित करना,
मुश्किल है लाशों के लिए
ख़ुद को मृत साबित करना,
असंभव है कंकाल के लिए
यह साबित करना
कि वह तुम्हारी बहन है।
जीतू मुंडा,
जिनके कारण तुम कंकाल ढो रहे हो,
वे चल-फिर रहे हैं,
सांस ले रहे हैं,
पर ज़िंदा नहीं हैं।
मत ढोओ अपने कंधों पर
इतना बड़ा बोझ,
सोने दो अपनी बहन को क़ब्र में,
बड़े भोले हो तुम,
इतना भी नहीं जानते
कि नहीं पसीजता लाशों का दिल
कंकालों को देखकर।