शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

846. गुलाब



एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,

गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने। 


कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,

गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने। 


न कभी सुना था, न कभी सोचा था, 

एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने। 


जहां न खिला था, न खिल सकता था,

उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने। 


गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,

उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने। 


जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,

उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने। 


इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,

उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने। 


न नींद आती है, न चैन पड़ता है,

किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने? 







बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

832. कीचड़ कमल से

 


कमल,

इतना भी मत इतराओ,

मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें, 

तुमसे मैं नहीं, 

मुझसे तुम हो। 


मैं खिला सकता हूँ 

तुम जैसे कई कमल,

ज़िंदा रह सकता हूँ 

तुम्हारे बिना भी। 


भ्रम में मत रहो, 

मैं तुम्हारे पैरों में हूँ, 

पर अपने लिए नहीं, 

तुम्हारे लिए। 


मैं आधार हूँ तुम्हारा, 

तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं, 

मैंने ही बचा रखा है तुम्हें 

लहरों में बह जाने से।