शुक्रवार, 25 मार्च 2022

६४१. नदी और पत्थर

 


नदी किनारे एक पत्थर

सालों से ऐसे ही पड़ा है,

चाहता है किसी के काम आए,

उस पर भी कोई चलाए

कभी छैनी-हथौड़ा।

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नदी ने बड़े पत्थर को

घिस-घिस कर छोटा कर दिया है,

पत्थर ख़ुश है

कि वह चमका तो सही।

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नदी किनारे पड़ा पत्थर

अपनी जगह नहीं छोड़ेगा,

साथ रहा है लहराती नदी के,

अब जब वह सूख गई है,

पत्थर उसे छोड़कर

कहीं नहीं जाएगा।

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बूढ़ी हो गई है नदी,

अब नहीं आ पाती

किनारे के पत्थरों तक,

पर जब कभी आती है,

सब को भिगो जाती है।

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नदी किनारे पड़ा पत्थर

अरसे से इंतज़ार में है 

कि कोई लहर आए,

तरोताज़ा कर दे उसको भी।

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बहुत दिनों से नहीं मिली

किनारे के पत्थरों से नदी,

पत्थर गुमसुम हैं,

नदी की भी आँखें गीली हैं।

सोमवार, 21 मार्च 2022

६४०. बूढ़ा पेड़

 


लोग जब बांधते हैं 

मनौती का धागा,

बूढ़ा पेड़ दुआ करता है 

कि मुराद पूरी हो. 

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जब ज़ोर से चलती है हवा,

तो सहम जाता है बूढ़ा पेड़,

जबकि झेल चुका है वह 

न जाने कितने तूफ़ान. 

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एक अरसे बाद 

बूढ़े पेड़ पर उगी हैं

थोड़ी-सी पत्तियां,

उसे लगता है, 

वह अभी जवान है. 

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खेल-खेल में बच्चे 

तोड़ना चाहते हैं पत्तियां,

बूढ़े पेड़ ने झुका दी है 

अपनी डाली ज़रा-सी. 

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बूढ़े पेड़ पर अब 

न फल हैं, न पत्ते, 

पर देने के लिए उसके पास 

बहुत कुछ है अभी भी. 

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बूढ़े पेड़ की डाली पर 

अब नहीं रहे  

झूलों के निशान,

पर भूला नहीं है वह 

सावन की मस्ती. 

 

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

६३९. इस बार की होली




इस बार ख़ूब खेली होली मैंने,

पर बात कुछ बनी ही नहीं. 


बहुत लगाया अबीर-गुलाल सब ने ,

पर रंग कोई चढ़ा ही नहीं,

पिचकारियां भी चलाईं,गुब्बारे भी फेंके,

पर मन था कि भीगा ही नहीं. 


ख़ूब खाईं मिठाइयाँ होली में,

पर जीभ से परे  मिठास गई ही नहीं,

गले तो बहुत मिला लोगों से मगर,

मन किसी ने छुआ ही नहीं. 


इस बार ख़ूब खेली होली मैंने,

पर महसूस कुछ हुआ ही नहीं,

क्या मैं बस एक दर्शक था

खेलने वाला मैं था ही नहीं?


मंगलवार, 15 मार्च 2022

६३८.अधमरा आदमी



मरा हुआ आदमी

जी नहीं सकता,

पर अधमरा

पूरा मर भी सकता है

और पूरा जी भी सकता है.


चलो,

थोड़ी जान फूंकते हैं

अधमरे लोगों में,

बचाते हैं उन्हें मरने से.


ऐसे लोग कहीं दूर नहीं,

हमारे आसपास ही हैं,

हम उन्हें देख सकते हैं

अगर अपनी आँखें खुली रखें

और पूरे जीवित रहें।


शनिवार, 12 मार्च 2022

६३७. सपेरे से

 



सपेरे,

सावधान रहना,

जो साँप तुमने पाल रखे हैं,

तुम्हें भी डस सकते हैं. 

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सपेरे,

जब साँप नाचे,

तो तुम भी नाचो,

किसी के साथ नाचना 

अकेले नाचने से बेहतर है. 

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सपेरे,

तुम्हें लगता है 

तुम साँप को नचा रहे हो,

पर ध्यान से देखो,

तुम उसे नहीं,

वह तुम्हें नचा रहा है. 

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सपेरे,

साँप को पिटारी में बंद कर 

बेफ़िक्र मत हो जाना,

तुम्हें डसने के लिए उसका 

खुला होना ज़रूरी नहीं है. 

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सपेरे,

बहुत नचाया तुमने साँप को,

अब ख़ुद भी नाच लो,

नाचने का मज़ा ही कुछ और है,

अगर कोई नचाए नहीं.


गुरुवार, 10 मार्च 2022

६३६. वे दिन




बचपन में जब मैं 

पिता के कंधे पर बैठता था,

तो जैसे किसी दूसरी दुनिया में 

पहुँच जाता था. 


ख़ुद को सबसे बड़ा 

महसूस करता था, 

बड़े भाई-बहनों से भी बड़ा,

जो पिता के साथ चलते थे. 


मुझे लगता था,

मैं जैसे कोई राजा हूँ,

सिंहासन पर बैठा हूँ 

और बाक़ी सब मेरी प्रजा हैं. 


अब पिता नहीं हैं,

बड़ा हो गया हूँ मैं,

अब कोई कंधा नहीं है,

जिस पर सवार हो सकूं मैं. 


ज़मीन पर चलते हुए 

अब मुझे लगता है 

कि मैं बहुत छोटा हूँ,

सबसे छोटा. 


काश कि वे दिन लौट आते, 

काश कि मैं फिर से 

उतना बड़ा हो पाता,

जितना बचपन में हुआ करता था.