शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

१०१. लालच

लद्दाखी मार्मोट(एक तरह का चूहा)




बहुत सोच-समझकर बस्ती से दूर
यहाँ जंगल में महफूज़ जगह  पर
तुमने अपना ठिकाना बनाया,
पर अब यह जगह सुरक्षित नहीं रही,
अब हमने यहाँ तक सड़कें बना ली हैं,
हमने तुम्हें ढूंढ निकाला है,
अब तुम हमारे मनोरंजन का साधन हो.

हम तुम्हारे ठिकाने देखेंगे,
सड़े-गले बिस्किट फेंककर,
बचे-खुचे वेफर्स दिखाकर
तुम्हें ललचाएंगे,
बिल से बाहर निकालेंगे,
तुम्हारे साथ फोटो खिंचवाएंगे,
फिर तुम्हें अंदर जाने देंगे,
या शायद न जाने दें.

बिस्किट और वेफर्स का लालच छोड़ 
तुम बिल में ही क्यों नहीं रहते,
तुम भूख से नहीं मरोगे,
जंगली जानवरों से भी नहीं,
तुम अपने बिल में जीवित रहोगे,
अगर तुम अपने लालच से बच जाओ.

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

१००. मुज़फ्फरनगर से


मुज़फ्फरनगर, तुम्हें शायद याद न हो,
पर स्वाधीनता के आंदोलन में 
तुम्हारे पुरखे- हिंदू और मुसलमान-
साथ-साथ लड़े थे अंग्रेजों से.

विभाजन के समय 
जब देश जल रहा था,
तुम शांत बने रहे;
बाबरी मस्जिद टूटी,
पर तुम जुड़े रहे.

फिर इस बार क्या हुआ तुम्हें,
क्यों भूल गए अपना इतिहास,
क्यों भूल गए अपनी संस्कृति?
क्यों कर दिया तुमने
हिंदुओं के मुज़फ्फरनगर को 
मुसलमानों के मुज़फ्फरनगर से अलग?

क्या तुम्हारा पानी बदल गया 
या हवा बदल गई अचानक?
ऐसा क्या हो गया कि
वहशियत की हदें तोड़ दीं  तुमने?

बहुत गलत किया तुमने,
विरासत दागदार हो गई तुम्हारी,
बदनाम हो गए तुम,
मुज़फ्फरनगर, अब तुम चुपचाप 
अपना नाम बदल लो.