शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

६६७.रोटियाँ

 


वैसे तो रोटी का आकार 

कुछ भी हो सकता है,

पर भूखे लोगों को भाती हैं 

गोल-गोल रोटियाँ. 

रोटी गोल होती है,

तो भ्रम पैदा होता है 

कि उसका कोई छोर नहीं है. 

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जिस तरह पी सकता है एक साथ

ऊँट कई दिनों का पानी,

काश कि खा पाता इंसान 

कई दिनों की रोटियाँ

और हो जाता मुक्त 

रोज़-रोज़ के झंझट से. 

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गोल होती है रोटी 

पृथ्वी की तरह,

पर बेहतर होती है पृथ्वी से,

उसे खाया जा सकता है,

वह घूमती भी नहीं है.

शनिवार, 24 सितंबर 2022

६६६.भगोने में दूध

 


कब तक उबलते रहोगे 

अंदर-ही-अंदर?

बहुत हो गया,

भगोने से निकलो,

बुझा दो वह आग,

जो तुम्हें जला रही है. 

***

मैंने तो नहीं कहा था 

कि मुझे चढ़ाओ चूल्हे पर,

अब तुमने चढ़ा ही दिया है,

तो मुझे भी देखना है 

कि कितना जला सकती हो 

मुझे जीते जी तुम. 

***

बाद में कुछ नहीं होगा,

अभी साहस करो,

बाहर निकलो,

अंदर-ही-अंदर जलते रहे,

तो ख़त्म कर देगी 

तुम्हें यह आग. 

***

थोड़ा-सा सह लो,

जलना ज़रूरी है,

यह आग ही है,

जो निखारेगी तुम्हें,

यह आग ही है,

जो पहुँचाएगी तुम्हें 

तुम्हारे एसेंस तक. 


शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

६६५.दीवारें

 


जब तक मेरे घर में 

कोई दीवार नहीं थी, 

घर बड़ा-सा लगता था,

अब दीवारें बन गई हैं,

तो लगता है,

एक ही घर में 

कई घर बन गए हैं. 

***

मुश्किल नहीं है

घर में दीवारें बनाना,

मुश्किल है,दीवारों को हटाना,

मुश्किल है, घर को फिर से घर बनाना. 

***

कैसा भी सीमेंट डालो,

कैसी भी ईंटें,

घर की दीवारें 

कमज़ोर करती हैं घर को.

***

मैं तोड़ना चाहता हूँ दीवारें,

मुझे बड़ा घर चाहिए,

बड़े घर में कई 

छोटे-छोटे घर नहीं. 

***

उसने पुकारा मुझे 

दीवार के उस पार से,

मैंने कुछ सुना ही नहीं।

छीन लेती हैं दीवारें 

देखने की ही नहीं,

सुनने की भी ताक़त.