शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

४६४. चाय और कविता

Black Coffee, Coffee, Cup, Desk, Drink

इन दिनों मुझसे 
रूठी हुई है मेरी कविता.

कभी वे भी दिन थे,
जब एक कप चाय पर 
मुकम्मल हो जाती थीं 
मेरी कई सारी कविताएँ.

अब लग जाता है मेज़ पर 
ख़ाली कपों का ढेर,
पर काग़ज़ है  
कि कोरा ही पड़ा रहता है.

शायद चाय पी-पीकर 
ऊब गई है मेरी कविता,
अब क्या पिलाऊँ उसे 
कि लौट आए मेरी कविता. 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

४६३.साझा संपत्ति

Boy, Child, Dad, Family, Father, Female

कैसे तय कर दी तुमने 
उसकी नियति अकेले-अकेले?
कैसे भूल गए तुम 
कि वह मेरी भी संतान है?

मैंने रचा है उसे 
ख़ुद में छिपाकर,
महीनों तक सींचा है उसे 
अन्दर-ही-अन्दर.

याद रखना
कि जिस संपत्ति का भविष्य
तुम तय करना चाहते हो,
वह तुम्हारी अकेले की नहीं 
साझा संपत्ति है.

शनिवार, 25 जुलाई 2020

४६२. अनदेखा

Rays, Sun, Light, Fog, Forest, Sky

किसी रोज़ समय मिले,
तो अपने अन्दर भी झांक लो,
बहुत कुछ दिखेगा वहां,
जो तुम्हें पता ही नहीं था 
कि तुम्हारे अन्दर छिपा है.

कितनी  अजीब बात है 
कि हम दूर-दूर जाते हैं,
देख लेते हैं सब कुछ,
पर उसे नहीं देख पाते,
जो हमारे सबसे क़रीब है.

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

४६१. गहने

grayscale photography of person wearing hoodie hiding face with both hands

बहुत प्यार करते थे 
सारे बच्चे माँ से,
सबने ले लिए 
धीरे-धीरे उसके गहने - 
किसी ने कंगन,
किसी ने हार,
किसी ने पायल,
किसी ने झुमके.

अब गहने ख़त्म हुए,
सिर्फ़ माँ बची है,
बच्चों में ढूंढती फिरती है 
वह पहले जैसा प्यार.

देर से समझ पाई है माँ 
गहनों से प्यार का रिश्ता.

सोमवार, 20 जुलाई 2020

४६०. यात्रा

कौन थे वे,
जो सिर पर घर लादे 
चले जा रहे थे 
अपने घरों की ओर?

छालों भरे पांव,
भूख से अकड़े पेट -
न जाने कहाँ से चलकर 
आए थे वे,
न जाने कहाँ तक चलकर 
जाना था उन्हें?

कौन थे वे,
जिनकी उंगलियाँ थामे
चले जा रहे थे बच्चे,
जिनकी औरतें 
भारी पाँवों के साथ 
बढ़ी जा रही थीं 
मंज़िल की ओर.

कोरोना के डर से बेख़बर,
हिदायतों को दरकिनार कर 
लाठी,डंडे,गालियां खाकर, 
कभी खुलकर,कभी छिपकर 
बढ़े चले जा रहे थे वे.

यक़ीन नहीं होता था उन्हें देखकर 
कि मौत से सब डरते हैं. 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

४५९.मनचाही मृत्यु

'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी कविता:


उन्होंने कहा,
मरने के लिए तैयार रहो,
सारा इंतज़ाम है हमारे पास-
गोली, चाकू, डंडा, फंदा,
तुम ख़ुशकिस्मत हो,
बता सकते हो
कि तुम्हें कैसे मरना है.
पूरी कविता पढ़ने के लिए लिंक खोलें. https://www.raagdelhi.com/poetry-onkar-2/

बुधवार, 15 जुलाई 2020

४५८. छोटा

Mother, Son, Baby, Beach, Sunset

जब वह गर्भ में आया,
निढाल हो चुकी थी माँ
बच्चे जनते-जनते,
हाँफते-हाँफते दौड़कर 
मंज़िल तक पहुँची थी.

छोटे से बहुत प्यार है माँ को,
छोटा उसके श्रम का निचोड़ है.

सोमवार, 13 जुलाई 2020

४५७. दंड

Hanging Rope, Rope, Hangman, Hanging, Hang, Punishment

यह कहना सही नहीं है 
कि उसे मृत्युदंड मिला है,
दंड अपराध के लिए होता है,
उसका अपराध तो साबित ही नहीं हुआ,
उसे मौक़ा ही नहीं मिला,
तुमने दिया ही नहीं,
तुमने कभी चाहा ही नहीं 
कि उसके साथ न्याय हो.

सुनो,
तुम जिसे मृत्युदंड कहते हो,
वह दरअसल हत्या है.

शनिवार, 11 जुलाई 2020

४५६.उपलब्धि

Road, Forest, Season, Autumn, Fall

एक मंज़िल है,
जिसकी तरफ़  
न जाने कब से 
चला जा रहा हूँ मैं,
पर मंज़िल है कि 
बहुत दूर लगती है.

मुझे नहीं लगता 
कि मैं मंज़िल तक पहुंचूंगा,
पर कम-से-कम
जहाँ से चला था,
वहां से तो आगे निकलूँगा 

मंज़िल न मिले तो न सही,
आगे बढ़ते रहना 
और चलते रहना ही होगी 
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि.

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

४५५.उद्घोष


Leaf, Green, Environment, Natural, Plant

वह बगीचा वीरान था,
न फूल थे वहां,न फल,
डालियाँ सूख गई थीं,
कलियाँ कुम्हला गई थीं,
पौधे निर्जीव से खड़े थे.

बस एक पत्ता था,
जो अब भी हरा था,
पूरी सृष्टि उसे  
सुखाने पर आमादा थी.

वह अदना-सा पत्ता 
मृत्यु के सन्नाटे में 
जीवन का उद्घोष था.

सोमवार, 6 जुलाई 2020

४५४. घर

House, Residence, Blue, House, House

नए घर में आई थी वह औरत,
बड़ा आरामदेह घर था वह,
हर कमरा हवादार था उसका,
धूप आती थी उसकी बालकनी में.

औरत ने सुन रखा था यह सब,
महसूस नहीं किया था कभी,
क्योंकि घर के किचन के बाहर 
उस औरत का कोई घर नहीं था.

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

४५३. गिलहरी

Squirrel, Young, Young Animal, Mammal

सूखी डालियों पर 
इधर से उधर 
भागती रहती है गिलहरी,
गुदगुदी होती है पेड़ को,
पत्ता-पत्ता हिलता है उसका.
**
वह गिलहरी,
जो फुदकती रहती थी 
पेड़ पर दिनभर,
कहीं चली गई है,
बूढ़ा लगने लगा है पेड़ 
उसके इंतज़ार में.
**
एक नन्ही-सी गिलहरी 
फुदकती रहती है
कभी इस डाल पर,
कभी उस डाल पर,
कभी इस पेड़ पर,
कभी उस पेड़ पर.
कितनी अमीर है 
एक छोटी सी गिलहरी,
पूरा जंगल उसका है.