बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

३००. होलिका दहन

क्या जला रहे हो इस बार 
होलिका दहन में?
गोबर के उपले?
कोयला, लकड़ियाँ?
बस यही सब?

जला देना इस बार 
थोड़ा-सा अहम्,
थोड़ा-सा गुस्सा,
थोड़ा-सा लालच,
थोड़ा-सा स्वार्थ.

और ध्यान रहे,
प्रह्लाद को बचाने में 
इतना न खो जाना 
कि जल जाय 
तुम्हारा स्वाभिमान,
राख हो जाय 
तुम्हारी संवेदना.

इस बार होलिका दहन में 
कुछ और बचे न बचे,
बचा लेना किसी भी तरह 
अपनी आत्मा,
अपनी इंसानियत.

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

२९९. मेरे कस्बे का स्टेशन

मेरे कस्बे के स्टेशन पर
एक इकलौती ट्रेन रूकती है,
मुसाफ़िर उतरते हैं,
मुसाफ़िर चढ़ते हैं,
इंतज़ार करते हैं उसके पहुँचने का.

कुछ चायवाले, कुछ समोसेवाले,
पान-बीड़ी,मूंगफलीवाले,
न जाने कौन-कौन 
क्या-क्या बेचते हैं प्लेटफ़ॉर्म पर.

स्टेशन के पास उग आए हैं 
कुछ छोटे-छोटे ढाबे,
ठहरने के लिए कुछ मामूली होटल,
ऊंघते दिख जाते हैं यहाँ 
कुछ रिक्शे, कुछ ठेले. 

ट्रेन आती है, चली जाती है,
उसे नहीं मालूम 
कि कितना कुछ दे दिया है उसने
मेरे इस छोटे से कस्बे को.

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

२९८. अनकहा

कभी कुछ कहना चाहो,
तो कह देना,
मैं बुरा नहीं मानूंगा,
अच्छा ही लगेगा मुझे.

कहाँ छुप पाता है कुछ अनकहा,
जो कोई कहना चाहता हो,
शब्दों में न सही,
आँखों में तो झलक ही जाता है.

आधा अधूरा व्यक्त हो,
अटकलों को जन्म दे,
ग़लतफ़हमियाँ फैलाए,
इससे तो अच्छा है 
कि फूटकर बह निकले 
मवाद की तरह,
किसी एक को तो चैन मिले.

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

२९७.अलाव

आओ, अलाव जलाएँ,
सब बैठ जाएँ साथ-साथ,
बतियाएँ थोड़ी देर,
बांटें सुख-दुख,
साझा करें सपने,
जिनके पूरे होने की उम्मीद 
अभी बाक़ी है.

हिन्दू, मुसलमान,
सिख, ईसाई,
अमीर-गरीब,
छोटे-बड़े,
सब बैठ जाएँ 
एक ही तरह से,
एक ही ज़मीन पर,
खोल दें अपनी 
कसी हुई मुट्ठियाँ,
ताप लें अलाव.

घेरा बनाकर तो देखें,
नहीं ठहर पाएगी 
इस अलाव के आस-पास 
कड़ाके की ठंड.

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

२९६.अँधेरे में

ऐसा क्यों होता है 
कि कुछ लोगों को हमेशा 
अँधेरे में रहना पड़ता है 
और कुछ के जीवन से 
उजाला दूर ही नहीं होता?

क्या ऐसा संभव नहीं 
कि सब हमेशा उजाले में रहें?
अगर नहीं, तो कम-से-कम इतना हो जाय 
कि हरेक के हिस्से में 
समान अँधेरा और उजाला हो.

अगर यह भी संभव नहीं,
तो आओ, ख़ुदा से कहें 
कि अपना उजाला वापस ले ले 
और सब को एक साथ,एक तरह से 
अँधेरे में ही रहने दे.