शनिवार, 25 नवंबर 2017

२८६. कविता

मैंने छोड़ दिया है अब 
कविता लिखना.

कविता लिखने का सामान -
काग़ज़, कलम,दवात -
दूर कर दिया है मैंने,
यहाँ तक कि कुर्सी-मेज़ भी 
हटा दी है अपने कमरे से.

मन में भावनाओं का 
ज्वार उमड़ रहा हो,
शब्द अपने-आप 
लयबद्ध होकर आ रहे हों,
तो भी नहीं लिखता मैं 
कोई कविता.

मैंने तय कर लिया है 
कि मैं तब तक नहीं लिखूंगा 
कोई नई कविता,
जब तक कि उसमें लौट न आए  
कोई आम आदमी.

रविवार, 19 नवंबर 2017

२८५.परिवर्तन


पत्तों से भरा सेमल का पेड़
ख़ुश था बहुत,
हवाएं उसे दुलरातीं,
पथिक सुस्ता लेते 
उसकी घनी छाया में,
फुदकते रहते पंछी 
उसकी हरी-भरी टहनियों में.

एक दिन पत्तियां गुम हुईं,
फूलों से लद गया सेमल,
जो भी देखता उसे,
बस देखता ही रह जाता,
फूला न समाता 
आत्म-मुग्ध सेमल.

पर ये दिन भी निकल गए,
अब न फूल हैं, न पत्ते,
न पक्षी हैं, न पथिक,
आज सेमल अकेला है,
बहुत उदास है सेमल.

इस बार जब पत्ते आएंगे,
सेमल उन्हें बाँहों में जकड़ लेगा,
गिरने नहीं देगा उन्हें,
सूखने नहीं देगा उनका रस.

इस बार जब फूल आएंगे,
सेमल ध्यान रखेगा उनका,
बिछड़ने नहीं देगा उन्हें,
बचाएगा उन्हें बुरी नज़र से.

इस बार जब फुदकेंगे पंछी,
सेमल उन्हें उड़ने नहीं देगा,
ओझल नहीं होने देगा उन्हें,
चौकसी करेगा उनकी.

सेमल नहीं जानता
कि ऐसा हो नहीं सकता,
ऐसा होना भी नहीं चाहिए,
सेमल नहीं जानता 
कि परिवर्तन ही नियम है,
परिवर्तन ही अच्छा है.

रविवार, 5 नवंबर 2017

२८४. आख़िरी कदम

बहुत दूर से,
बहुत देर से,
बहुत तकलीफ़ सहकर 
तुम आख़िर पहुँच ही गई 
मेरे दरवाज़े तक.

मैंने भी लगभग 
खुला छोड़ रखा था दरवाज़ा,
तुम दस्तक देती,
तो खुल जाता अपने आप,
पर दरवाज़े तक आकर
तुम वापस लौट गई,
मैंने भी आहट सुन ली थी 
तुम्हारे आने की,
पर दस्तक के इंतज़ार में रहा.

हम जब एक लम्बा सफ़र 
तय कर लेते हैं,
तो एक आख़िरी कदम बढ़ाना 
इतना मुश्किल क्यों हो जाता है,
या फिर आख़िरी कदम
वही क्यों नहीं बढ़ा लेता,
जिसने कोई सफ़र किया ही न हो.