शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

१३७. नाटक

बहुत दिन हो गए,
चलो, एक बार फिर 
तुम्हारा हाथ मरोड़ दूं,
बस उतना ही 
कि तुम्हें दर्द न हो,
पर तुम दर्द होने का 
नाटक कर सको.

मैं तुरंत छोड़ दूं तुम्हारा हाथ 
और तुम नाटक कर सको  
मुझसे रूठ जाने का.

मैं तुम्हें मनाऊँ 
और तुम नाटक करो 
न मानने का.
तुम्हारे रूठे रहने पर 
मैं तुमसे रूठने का नाटक करूँ
और घबराकर तुम मुझे मनाओ.

बचपना क्या छोड़ा 
अजनबी हो गए हम,
चलो, कुछ बचकानी हरकतें करें,
थोड़ा-सा नाटक करें,
साथ-साथ चलने के लिए 
थोड़ा बचपना, थोड़ा नाटक 
बहुत ज़रुरी है.

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

१३६. किनारा लहरों से



लहरों, मुझसे अठखेलियाँ मत करो.

तुम अचानक उछलकर आती हो,
मुझे आलिंगन में जकड़कर
गहरे तक भिगो जाती हो,
जब तक मैं कुछ समझ पाऊँ,
तुम फिर समंदर में खो जाती हो.

खुद को किसी तरह समझाकर 
मैं अलगाव को स्वीकारता हूँ,
पर मेरी भावनाओं से खेलने 
तुम फिर चली आती हो.

लहरों, मुझे बख्श दो,
भ्रमित मत करो मुझे,
मैं खेल का सामान नहीं हूँ,
स्थिर हूँ,स्थिरता चाहता हूँ.

तय करो कि तुम्हें क्या करना है,
अगर आना है तो आ जाओ,
अगर आकर चले जाना है,
तो बेहतर है कि मुझे अकेला छोड़ दो.

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

१३५. मैं

जो मैं समझता हूँ कि मैं हूँ,
दरअसल मैं वह नहीं हूँ.

मैं वह भी नहीं हूँ,
जो तुम समझते हो 
कि मैं हूँ.

न तुम जानते हो,
न मैं 
कि मैं क्या हूँ.

मेरा मैं 
अनगिनत परतों के नीचे 
कहीं दबा पड़ा है,
जिन्हें हटाकर देखना 
नामुमकिन सा लगता है.

फिर भी कभी  
मुझे पता चल गया 
कि मैं क्या हूँ,
तो तुम्हें बता दूंगा,
तुम्हें भी अगर  
भनक लग जाय
तो मुझे बता देना.

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

१३४. कविता

मन के आसमान में आज 
छाए हैं घने-काले बादल 
विचारों और खयालों के,
तेज़ बह रही हैं 
कल्पनाओं की आंधियां,
फिर भी न जाने क्यों 
बरस नहीं रही एक भी बूँद, 
लिखी नहीं जा रही 
एक भी कविता....